उपराष्ट्रपति का विकास पर जोर: हर व्यक्ति तक पहुंचे लाभ
समावेशिता से लोकतंत्र की मजबूती
नई दिल्ली, तीन अक्टूबर: उपराष्ट्रपति सी पी राधाकृष्णन ने शनिवार को कहा कि लोकतांत्रिक प्रणाली को बनाए रखने के लिए यह आवश्यक है कि विकास का लाभ सभी लोगों तक पहुंचे। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि ऐसा नहीं हुआ, तो युवाओं का लोकतंत्र में विश्वास कमजोर हो सकता है। उन्होंने यह भी बताया कि समावेशिता से विकास को स्थायी बनाने में मदद मिल सकती है और निर्णय लेने में आम सहमति आवश्यक है।
कौटिल्य आर्थिक सम्मेलन में विचार
उपराष्ट्रपति ने यहां पांचवें कौटिल्य आर्थिक सम्मेलन का उद्घाटन करते हुए भारतीय अर्थव्यवस्था और विकास की संभावनाओं पर चर्चा की। राधाकृष्णन ने कहा कि विकास का लाभ समाज के सभी वर्गों तक पहुंचना चाहिए। यदि ऐसा नहीं होता है, तो लोग, खासकर युवा, लोकतंत्र में अपना विश्वास खो सकते हैं।
साम्यवाद और लोकतंत्र
उन्होंने कहा कि कुछ हिस्सों में साम्यवाद की वापसी की बातें हो रही हैं। राधाकृष्णन ने स्पष्ट किया कि वे साम्यवाद के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन एक प्रभावी लोकतांत्रिक प्रणाली का स्थान कोई अन्य शासन प्रणाली नहीं ले सकती। राज्यसभा के सभापति के रूप में उनका मानना है कि स्वतंत्र और पारदर्शी चर्चा ही लोकतंत्र को मजबूत बनाती है।
विकास की दिशा में भारतीय अर्थव्यवस्था
उपराष्ट्रपति ने कहा कि हर व्यक्ति को अपनी बात रखने, काम करने, कानूनी तरीके से कमाने और अपनी इच्छानुसार धन खर्च करने का अधिकार होना चाहिए। उन्होंने बताया कि भारतीय अर्थव्यवस्था अब अल्पविकसित से विकासशील और विकसित होने की ओर बढ़ रही है। हम तभी विकसित अर्थव्यवस्था कहलाएंगे जब इसका लाभ सभी तक पहुंचे।
वैश्विक तनाव और नीति निर्माण
उपराष्ट्रपति ने तेजी से बदलते वैश्विक परिदृश्य में आम सहमति से निर्णय लेने की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि नीति निर्माताओं को जमीनी तथ्यों से अवगत रहना चाहिए और नीति निर्माण में लचीलापन होना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि भारत ने यह साबित किया है कि लोकतंत्र और विकास एक साथ आगे बढ़ सकते हैं।
आर्थिक मजबूती और सामाजिक समावेशिता
उन्होंने बताया कि आर्थिक मजबूती को सामाजिक मजबूती से अलग नहीं किया जा सकता। वित्तीय समावेश और पारदर्शिता को बढ़ाने में प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (डीबीटी), जीएसटी और जैम त्रिमूर्ति (जन धन योजना, आधार और मोबाइल) ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
जन धन खातों की संख्या
राधाकृष्णन ने कहा कि अगस्त 2026 तक 59 करोड़ से अधिक जन धन खाते खोले जा चुके हैं, जबकि जीएसटी पंजीकरण का आंकड़ा 2017 में लगभग 66.5 लाख से बढ़कर मई 2026 में 1.65 करोड़ हो गया है।
