एनसीएलटी ने एम्पायर ट्रांसपोर्ट सर्विसेज की दिवाला याचिका खारिज की
एनसीएलटी का निर्णय
राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण (एनसीएलटी) ने एम्पायर ट्रांसपोर्ट सर्विसेज लिमिटेड (ईटीएसएल) द्वारा नोएडा मेट्रो रेल कॉरपोरेशन (एनएमआरसी) के खिलाफ दायर दिवाला याचिका को अस्वीकार कर दिया है। न्यायाधिकरण ने यह पाया कि दोनों पक्षों के बीच सेवा की गुणवत्ता, अनुबंध संबंधी दायित्वों और भुगतान में कटौती को लेकर पहले से ही विवाद चल रहा है।
एनसीएलटी की इलाहाबाद पीठ ने दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता (आईबीसी) की धारा-9 के तहत एनएमआरसी के खिलाफ कॉरपोरेट दिवाला समाधान प्रक्रिया (सीआईआरपी) शुरू करने की ईटीएसएल की याचिका को खारिज कर दिया।
ईटीएसएल का दावा
ईटीएसएल ने 15 जनवरी 2016 को एनएमआरसी के साथ हुए 'बस ऑपरेटर' समझौते के तहत लगभग 7.09 करोड़ रुपये के परिचालन बकाये का दावा किया। समझौते के अनुसार, ईटीएसएल को नोएडा, ग्रेटर नोएडा और उनके बीच संपर्क मार्गों पर 100 लो-फ्लोर एसी सीएनजी बसों का संचालन करना था, लेकिन केवल 50 बसें ही सेवा में लगाई गईं।
ईटीएसएल ने शेष 50 बसों के संचालन के लिए एनएमआरसी से संपर्क किया, लेकिन कोई उत्तर नहीं मिला। समझौते के अनुसार, एनएमआरसी को बिल प्राप्त होने के एक सप्ताह के भीतर 50 प्रतिशत भुगतान और अगले 15 दिनों में शेष राशि का भुगतान करना था।
भुगतान में देरी और विवाद
समझौते में यह भी उल्लेख किया गया था कि यदि भुगतान में देरी होती है, तो एनएमआरसी को प्रतिदिन नौ प्रतिशत की चक्रवृद्धि ब्याज दर से भुगतान करना होगा। ईटीएसएल ने आरोप लगाया कि उसने 25 अप्रैल 2019 से 16 मार्च 2020 के बीच 'बिल' दिए, लेकिन कोई भुगतान नहीं मिला। इसके बाद उसने आईबीसी की धारा-8 के तहत नोटिस जारी किया और चूक का दावा करते हुए याचिका दायर की।
एनएमआरसी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सुनील फर्नांडीस और अधिवक्ता अभिषेक प्रसाद ने तर्क किया कि आईबीसी के तहत कोई भुगतान चूक नहीं हुई है। उन्होंने कहा कि ईटीएसएल ने अनुबंध के अनुसार सेवाएं देने में बार-बार विफलता दिखाई और कई उल्लंघनों के लिए कारण बताओ नोटिस जारी किए गए।
एनसीएलटी का निष्कर्ष
एनसीएलटी ने कहा कि विवाद केवल भुगतान न होने का नहीं है, बल्कि सेवा की गुणवत्ता और अनुबंध के तहत की गई कटौतियों को लेकर गंभीर मतभेदों का है। न्यायाधिकरण ने यह भी बताया कि एनएमआरसी ने सेवा में कई कमियों के लिए कई कारण बताओ नोटिस जारी किए थे, जिनमें जीपीएस और यात्री सूचना प्रणाली की खराबी, टूटी हुई विंडशील्ड, विकलांगों के लिए रैंप की खराब स्थिति, स्टॉप बटन का काम न करना, अपर्याप्त बस तैनाती, एयर कंडीशनिंग की समस्याएं और वैधानिक अनुपालन में कमी शामिल हैं।
उच्चतम न्यायालय के 'मोबिलॉक्स इनोवेशन्स प्राइवेट लिमिटेड बनाम किरूसा सॉफ्टवेयर प्राइवेट लिमिटेड' से संबंधित फैसले का हवाला देते हुए न्यायाधिकरण ने कहा कि यदि मांग नोटिस जारी होने से पहले वास्तविक विवाद मौजूद हो, तो दिवाला आवेदन स्वीकार नहीं किया जा सकता।
निष्कर्ष
एनसीएलटी ने कहा कि सेवा मानकों, अनुबंधीय प्रदर्शन, दंडात्मक कटौती और खातों के मिलान से जुड़े मतभेद स्पष्ट रूप से आईबीसी के तहत 'पूर्व-विद्यमान विवाद' की श्रेणी में आते हैं। आशीष वर्मा और प्रवीण गुप्ता की पीठ ने कहा, 'अतः धारा 5(6) के तहत वास्तविक एवं पूर्व-विवाद के अस्तित्व को देखते हुए... धारा-9 के तहत दायर वर्तमान आवेदन स्वीकार करने योग्य नहीं है और इसे खारिज किया जाता है।'
