एनसीएलटी ने एस्सेल समूह के सुभाष चंद्रा के दिवाला मामले में पांच सदस्यीय पीठ का गठन किया
सुभाष चंद्रा के दिवाला मामले में नया मोड़
राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण (एनसीएलटी) ने सोमवार को एस्सेल समूह के अध्यक्ष सुभाष चंद्रा के व्यक्तिगत दिवाला मामले की पुनर्भुगतान योजना पर निर्णय लेने के लिए एक पांच सदस्यीय पीठ का गठन किया। यह मामला 22,000 करोड़ रुपये से अधिक के दावों से संबंधित है। पहले की दो सदस्यीय पीठ ने बहुमत से निर्णय नहीं ले पाने के कारण यह कदम उठाया।
दो सदस्यीय पीठ ने तीसरे न्यायाधीश को मामला भेजने के बावजूद 6.5 करोड़ रुपये की पुनर्भुगतान योजना पर सहमति नहीं बना सकी, जिसके बाद इसे नए सिरे से सुनवाई के लिए न्यायाधिकरण के अध्यक्ष के पास भेजा गया। इस पांच सदस्यीय पीठ की अध्यक्षता न्यायमूर्ति अनूपिंदर सिंह ग्रेवाल करेंगे, जबकि अन्य सदस्य बचु वेंकट बालाराम दास, महेंद्र खंडेलवाल, अतुल चतुर्वेदी और रवींद्र चतुर्वेदी हैं।
पीठ मंगलवार को सुबह सवा दस बजे मामले की सुनवाई शुरू करेगी। इससे पहले, दो सदस्यीय पीठ भी बहुमत की राय पर नहीं पहुंच सकी थी, जिसके कारण कोई अंतिम आदेश नहीं दिया जा सका।
न्यायाधिकरण के न्यायिक सदस्य अशोक कुमार भारद्वाज और तकनीकी सदस्य रीना सिन्हा पुरी की पीठ ने बहुमत न बनने की स्थिति में मामले को एनसीएलटी अध्यक्ष के पास भेजा। यह मामला चार साल से चल रहा है और इसे तीसरे सदस्य नीलेश शर्मा के पास भेजा गया था। शर्मा ने 25 अगस्त को 144 पन्नों के आदेश में चंद्रा की व्यक्तिगत दिवाला समाधान योजना के तहत 6.5 करोड़ रुपये के भुगतान को मंजूरी दी थी, जबकि ऋणदाताओं के दावों का कुल मूल्य 22,006.57 करोड़ रुपये था।
इस प्रकार, ऋणदाताओं को बकाया राशि का लगभग 99.97 प्रतिशत नुकसान उठाना था। नियमों के अनुसार, तीसरे सदस्य की राय को मूल पीठ के पास औपचारिक आदेश के लिए भेजा गया था। हालांकि, सोमवार को मूल पीठ ने कहा कि तीसरे सदस्य ने स्वतंत्र राय दी है, जिससे कोई बहुमत की राय नहीं बन सकी।
पीठ ने बताया कि तकनीकी सदस्य ने समाधान योजना को खारिज किया, जबकि न्यायिक सदस्य ने इसे केवल उन ऋणदाताओं के लिए मंजूर किया जिन्होंने इसे स्वीकार किया था। असहमत ऋणदाताओं को चंद्रा से अपनी राशि वसूलने की स्वतंत्रता दी गई थी। पीठ ने कहा कि तीसरे सदस्य ने सभी ऋणदाताओं पर दिवाला एवं ऋणशोधन अक्षमता संहिता (आईबीसी) की धारा 115(1) समान रूप से लागू करते हुए योजना को मंजूरी दी और सभी ऋणदाताओं के दावों को समाप्त कर दिया।
मामले में मतभेद आईबीसी की धारा 79(2)(जी) की व्याख्या और इसे धारा 115(1) के साथ पढ़ने को लेकर है। धारा 115(1) ऋणदाताओं द्वारा पुनर्भुगतान योजना को मंजूरी देने की प्रक्रिया से संबंधित है। चंद्रा की समाधान योजना में 22,006.57 करोड़ रुपये के स्वीकृत दावों के मुकाबले ऋणदाताओं को 6.25 करोड़ रुपये लौटाने और प्रक्रियागत खर्च के लिए 25 लाख रुपये देने का प्रस्ताव है। तीसरे सदस्य शर्मा ने योजना को मंजूरी देते हुए कहा कि चंद्रा की व्यक्तिगत संपत्ति का मूल्य प्रस्तावित राशि से भी कम है और योजना खारिज होने पर ऋणदाताओं के लिए अधिक वसूली की संभावना नहीं रहेगी।
