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केंद्र सरकार ने ईंधन निर्यात पर टैक्स में बदलाव किया

केंद्र सरकार ने 16 अक्टूबर से डीजल के निर्यात पर अप्रत्याशित लाभ कर में कटौती की है, जबकि पेट्रोल के निर्यात पर शुल्क बढ़ा दिया गया है। यह निर्णय अंतरराष्ट्रीय बाजार की स्थिति और घरेलू ईंधन की उपलब्धता को ध्यान में रखते हुए लिया गया है। जानें इस बदलाव के पीछे के कारण और इसके प्रभाव।
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ईंधन निर्यात पर नए टैक्स नियम

केंद्र सरकार ने अंतरराष्ट्रीय बाजार और घरेलू परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए ईंधन निर्यात पर महत्वपूर्ण निर्णय लिया है। 16 अक्टूबर से शुरू होने वाले पखवाड़े के लिए डीजल के निर्यात पर अप्रत्याशित लाभ कर (विंडफॉल टैक्स) में बड़ी कटौती की गई है, जबकि पेट्रोल के निर्यात पर शुल्क बढ़ा दिया गया है। वित्त मंत्रालय द्वारा जारी अधिसूचना के अनुसार, ये परिवर्तन 16 अक्टूबर से लागू हो गए हैं।


डीजल और पेट्रोल पर शुल्क में बदलाव

विमान ईंधन (एटीएफ) के निर्यात पर शुल्क 10.5 रुपये प्रति लीटर पर स्थिर रखा गया है। डीजल के निर्यात पर विशेष अतिरिक्त उत्पाद शुल्क (एसएईडी) और सड़क एवं बुनियादी ढांचा उपकर मिलाकर अब 8.5 रुपये प्रति लीटर शुल्क लगेगा, जबकि पहले यह 16 रुपये प्रति लीटर था। अगले पखवाड़े के लिए पेट्रोल के निर्यात पर शुल्क 0.5 रुपये प्रति लीटर से बढ़ाकर 2.5 रुपये प्रति लीटर कर दिया गया है।


पश्चिम एशिया में तनाव और घरेलू ईंधन की उपलब्धता

पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के मद्देनजर, सरकार ने 27 मार्च को डीजल और विमान ईंधन के निर्यात पर शुल्क लगाया था। इसके बाद हर पखवाड़े इसकी दरों में संशोधन किया जाता रहा है। मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि घरेलू खपत के लिए उपलब्ध कराए जाने वाले पेट्रोल और डीजल पर मौजूदा शुल्क दरों में कोई बदलाव नहीं किया गया है।


निर्यातकों के लिए टैक्स का उद्देश्य

इस टैक्स का उद्देश्य निर्यातकों को अनुचित लाभ उठाने से रोकना भी था, क्योंकि युद्ध के बाद वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतें बढ़ गई थीं। पश्चिम एशिया संकट के बीच निर्यात को हतोत्साहित करके पेट्रोलियम उत्पादों की घरेलू उपलब्धता सुनिश्चित करना भी इस कर का मुख्य उद्देश्य था।