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टाटा संस का रजिस्ट्रेशन रद्द करने का प्रयास RBI ने किया खारिज

भारतीय रिजर्व बैंक ने टाटा संस की रजिस्ट्रेशन रद्द करने की मांग को खारिज कर दिया है, यह मामला टाटा ग्रुप की होल्डिंग कंपनी के कर्ज चुकाने के बावजूद नियमों के पालन से जुड़ा है। RBI का कहना है कि कंपनियों के बीच वित्तीय लेन-देन और कर्ज की गारंटी से पूरे सिस्टम पर जोखिम बना रहता है। जानें इस मामले में RBI की सख्ती और नए नियमों के बारे में।
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बिजनेस ग्रुप की कंपनियों के बीच कर्ज का लेन-देन

जब एक बड़ा बिजनेस ग्रुप होता है, तो उसमें कई कंपनियां शामिल होती हैं। भले ही ये कंपनियां कानूनी रूप से अलग हों, लेकिन इनके बीच वित्तीय लेन-देन, कर्ज और एक-दूसरे के लिए गारंटी देना सामान्य है। इस स्थिति में एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह उठता है कि यदि ग्रुप की एक कंपनी संकट में पड़ती है, तो क्या इसका प्रभाव अन्य कंपनियों पर भी पड़ेगा?


RBI का स्पष्ट निर्देश

हाल ही में भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने बड़े वित्तीय संस्थानों की निगरानी से संबंधित नियमों को स्पष्ट किया है। उनका कहना है कि बड़ी NBFCs और टाटा संस जैसी कंपनियों को अपने ग्रुप की बैलेंस शीट का उपयोग करना पड़ता है, इसलिए उन्हें रजिस्ट्रेशन और लिस्टिंग की प्रक्रिया का पालन करना होगा।


टाटा संस ने भारी कर्ज चुकाने के बाद RBI से रजिस्ट्रेशन रद्द करने की मांग की थी, ताकि उसे शेयर बाजार में लिस्ट होने से छूट मिल सके। लेकिन RBI ने यह कहते हुए उसकी अर्जी खारिज कर दी कि केवल कर्ज चुकाने से नियमों में छूट नहीं मिलेगी।


टाटा संस का मामला

यह मामला टाटा संस के संदर्भ में चर्चा का विषय बना हुआ है, जो टाटा ग्रुप की मुख्य होल्डिंग कंपनी है। RBI ने सितंबर 2026 में टाटा संस की रजिस्ट्रेशन रद्द करने की मांग को खारिज कर दिया। RBI ने स्पष्ट किया कि कंपनी को शेयर बाजार में लिस्ट होने से जुड़े नियमों का पालन करना होगा।



होल्डिंग कंपनी वह होती है जो सीधे उत्पाद नहीं बनाती, बल्कि अन्य कंपनियों में हिस्सेदारी रखती है और उनके बड़े निर्णय लेती है। टाटा संस भी इसी श्रेणी में आती है।


कर्ज चुकाने के बावजूद RBI की सख्ती

टाटा संस ने वित्त वर्ष 2023-24 में लगभग 21,813 करोड़ रुपये का कर्ज चुकाया था। इसके बाद कंपनी ने RBI से अनुरोध किया कि जब उसका कर्ज समाप्त हो गया है, तो उसे 'कोर इन्वेस्टमेंट कंपनी' (CIC) के रजिस्ट्रेशन से छूट दी जाए। लेकिन RBI का दृष्टिकोण अलग है।


RBI का मानना है कि किसी कंपनी का व्यक्तिगत कर्ज समाप्त होना और उसका वित्तीय नेटवर्क से अलग होना दो अलग बातें हैं। यदि होल्डिंग कंपनी कर्जमुक्त है, लेकिन उसके माध्यम से अन्य कंपनियां भारी कर्ज ले रही हैं, तो यह पूरे सिस्टम के लिए जोखिम पैदा कर सकता है।


नियमों में बदलाव

RBI ने बड़ी NBFCs पर नियंत्रण के लिए 2022 में एक ढांचा तैयार किया था। इसके तहत, जो कंपनियां 'अपर लेयर' में आती हैं, उन्हें तीन साल के भीतर शेयर बाजार में लिस्ट होना होगा। 2026 में RBI ने स्पष्ट किया कि 1 लाख करोड़ रुपये या उससे अधिक की संपत्ति वाली NBFCs सीधे 'अपर लेयर' में आएंगी।


इन कंपनियों को लिस्टिंग के नियमों का पालन करना अनिवार्य होगा। चूंकि टाटा संस इसी श्रेणी में आती है, इसलिए उसे बाजार में उतरना होगा। RBI का संदेश स्पष्ट है कि सभी कंपनियों के लिए नियम समान हैं और पारदर्शिता से कोई समझौता नहीं किया जाएगा।