टाटा संस के विवाद में बोर्ड सदस्यों की भूमिका पर चर्चा
टाटा संस का विवाद और रिजर्व बैंक की भूमिका
टाटा समूह की होल्डिंग कंपनी टाटा संस के संबंध में चल रहा विवाद अब भारतीय रिजर्व बैंक के नियमों और कंपनी की संभावित शेयर बाजार में लिस्टिंग से आगे बढ़कर उसके बोर्ड के कुछ प्रमुख सदस्यों की भूमिकाओं तक पहुंच गया है। विशेष रूप से, टाटा संस के दो प्रमुख निदेशक एन चंद्रशेखरन और वेणु श्रीनिवासन विभिन्न समयों पर भारतीय रिजर्व बैंक के केंद्रीय बोर्ड का हिस्सा रह चुके हैं।
एन चंद्रशेखरन को मार्च 2016 में रिजर्व बैंक के केंद्रीय बोर्ड में गैर-सरकारी निदेशक के रूप में नियुक्त किया गया था, जबकि उस समय वह टाटा संस के अध्यक्ष नहीं थे। जनवरी 2017 में उन्होंने टाटा संस की कमान संभाली। चंद्रशेखरन मार्च 2022 तक रिजर्व बैंक के केंद्रीय बोर्ड में बने रहे और वह केंद्र सरकार द्वारा नामित निदेशकों में शामिल थे।
इसके बाद, जून 2022 में वेणु श्रीनिवासन को रिजर्व बैंक के केंद्रीय बोर्ड में चार साल के लिए पार्ट टाइम गैर-सरकारी निदेशक के रूप में नियुक्त किया गया। वह अगस्त 2026 तक इस बोर्ड में रहेंगे। इस प्रकार, चंद्रशेखरन और श्रीनिवासन ने रिजर्व बैंक के केंद्रीय बोर्ड में एक साथ कार्य नहीं किया।
सूत्रों के अनुसार, टाटा संस से जुड़े इस मामले में दोनों की पूर्व संस्थागत भूमिकाओं पर चर्चा इसलिए हो रही है क्योंकि बाद में दोनों ने टाटा संस के बोर्ड में महत्वपूर्ण पदों पर कार्य किया। हालांकि, उपलब्ध जानकारी में यह स्पष्ट नहीं है कि रिजर्व बैंक में उनकी पूर्व भूमिका का टाटा संस से जुड़े निर्णयों पर कोई प्रभाव पड़ा हो।
टाटा संस के एक अधिकारी ने बताया कि चंद्रशेखरन का रिजर्व बैंक बोर्ड में कार्यकाल मार्च 2022 में समाप्त हुआ, जबकि टाटा संस को ऊपरी स्तर की गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनी के रूप में वर्गीकृत करने की प्रक्रिया सितंबर 2022 में शुरू हुई। रिजर्व बैंक ने टाटा संस की पंजीकरण से बाहर निकलने की अर्जी पर लगभग ढाई साल तक विचार किया।
यह ध्यान देने योग्य है कि रिजर्व बैंक ने अक्टूबर 2021 में गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों के लिए नया स्तर आधारित नियामक ढांचा लागू किया था, जिसमें कंपनियों को आधार, मध्य, ऊपरी और शीर्ष स्तर में वर्गीकृत किया गया। ऊपरी स्तर की कंपनी के लिए तीन साल के भीतर शेयर बाजार में लिस्टिंग होना अनिवार्य किया गया था। सितंबर 2022 में टाटा संस को ऊपरी स्तर की गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनी घोषित किया गया।
टाटा संस ने बाद में इस दर्जे से बाहर निकलने के लिए अपना पंजीकरण वापस करने की मांग की, लेकिन 11 सितंबर को रिजर्व बैंक ने आवेदन खारिज कर दिया और कंपनी को संबंधित नियमों का पालन करने का निर्देश दिया। इसके बाद टाटा संस के शेयर बाजार में आने का रास्ता फिर खुल गया।
17 सितंबर को टाटा संस के बोर्ड ने लिस्टिंग की दिशा में आगे बढ़ने का निर्णय लिया। वेणु श्रीनिवासन, हरीश मनवानी, अनिता एम. जॉर्ज और सौरभ अग्रवाल ने इसका समर्थन किया, जबकि नोएल टाटा ने इसका विरोध किया। इसी बैठक में चंद्रशेखरन को पांच साल का नया कार्यकाल देने का प्रस्ताव भी पारित हुआ, जिसका नोएल टाटा ने विरोध किया।
यह ध्यान देने योग्य है कि जुलाई 2025 में सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट और सर रतन टाटा ट्रस्ट ने सर्वसम्मति से कंपनी को शेयर बाजार में लिस्टिंग नहीं करने का निर्णय लिया था। मार्च 2024 में रतन टाटा के मार्गदर्शन में टाटा संस बोर्ड ने भी कंपनी को गैर-सूचीबद्ध रखने पर सहमति जताई थी। वेणु श्रीनिवासन और चंद्रशेखरन उस निर्णय का हिस्सा थे।
श्रीनिवासन की भूमिका महत्वपूर्ण है क्योंकि वह टाटा ट्रस्ट के ट्रस्टी होने के साथ-साथ टाटा संस बोर्ड में ट्रस्ट की ओर से नामित सदस्य भी हैं। टाटा ट्रस्ट के पास टाटा संस की लगभग 66% हिस्सेदारी है। इस प्रकार, लिस्टिंग के मुद्दे पर श्रीनिवासन और नोएल टाटा के अलग-अलग दृष्टिकोण ने विवाद को और बढ़ा दिया है। नोएल टाटा टाटा ट्रस्ट के अध्यक्ष हैं और लिस्टिंग के खिलाफ हैं। दोनों के बीच कंपनी के भविष्य के स्वामित्व ढांचे को लेकर मतभेद भी सामने आए हैं, जिससे टाटा संस का यह मामला अब समूह के भीतर बड़े निर्णय की परीक्षा बन गया है।
