ट्राई की नई सिफारिशें: उपग्रह संचार नेटवर्क के लिए लाइसेंस व्यवस्था
उपग्रह संचार के लिए नई लाइसेंस व्यवस्था
नई दिल्ली, 5 नवंबर: भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (ट्राई) ने हाल ही में उपग्रह संचार नेटवर्क प्रदाताओं के लिए एक अलग लाइसेंस प्रणाली बनाने का प्रस्ताव रखा है। इस प्रणाली के तहत, ये कंपनियां दूरसंचार ऑपरेटरों और अन्य योग्य सेवा प्रदाताओं को नेटवर्क बुनियादी ढांचा और क्षमता प्रदान कर सकेंगी, लेकिन वे सीधे उपभोक्ताओं को दूरसंचार सेवाएं नहीं दे पाएंगी। ट्राई की सिफारिशों से मोबाइल फोन को सीधे उपग्रह से जोड़ने की डायरेक्ट-टू-डिवाइस (डी2डी) सेवाओं का मार्ग प्रशस्त हो सकता है।
इस प्रस्ताव में उपग्रह और स्थलीय मोबाइल स्पेक्ट्रम दोनों का उपयोग किया जा सकेगा, जिससे उपग्रह संचार कंपनियों और पारंपरिक दूरसंचार कंपनियों के बीच सहयोग बढ़ने की संभावना है। ट्राई के अनुसार, अधिकृत उपग्रह संचार नेटवर्क (एससीएन) प्रदाता ‘सैटेलाइट कम्युनिकेशन नेटवर्क-एज-अ-सर्विस’ (एससीएनएएएस) के तहत योग्य सेवा प्रदाताओं को नेटवर्क क्षमता उपलब्ध करा सकेंगे।
उपग्रह आधारित सेवाएं प्रदान करने की अनुमति रखने वाली कंपनियां इस क्षमता को खरीद सकेंगी। यह व्यवस्था पूरे देश के लिए अधिकतम 20 वर्षों के लिए मान्य होगी, जिसे आगे 20 वर्षों तक नवीनीकरण किया जा सकेगा। मौजूदा लाइसेंसधारक कंपनियां भी यदि वे तकनीकी, नेटवर्क विस्तार और सुरक्षा संबंधी शर्तें पूरी करती हैं, तो एससीएनएएएस सेवा प्रदान कर सकेंगी।
ट्राई ने कहा कि इन सिफारिशों का मुख्य उद्देश्य देश में एक मजबूत और प्रतिस्पर्धी उपग्रह संचार पारिस्थितिकी तंत्र का विकास करना है। इससे उपग्रह नेटवर्क बुनियादी ढांचे और स्पेक्ट्रम का बेहतर उपयोग संभव होगा और नई उपग्रह आधारित सेवाओं को बढ़ावा मिलेगा। प्रस्ताव के अनुसार, एससीएन प्रदाता फीडर लिंक के लिए फिक्स्ड सैटेलाइट सर्विस (एफएसएस) और उपयोगकर्ता लिंक के लिए एफएसएस तथा मोबाइल सैटेलाइट सर्विस (एमएसएस) का स्पेक्ट्रम सरकार से प्राप्त कर सकेंगे।
फीडर लिंक का स्पेक्ट्रम प्रशासनिक आधार पर आवंटित किया जाएगा। उपयोगकर्ता लिंक के लिए प्रदाता को यह साबित करना होगा कि उसके साझेदार की सेवा दूरसंचार अधिनियम की पहली अनुसूची के अंतर्गत आती है। स्पेक्ट्रम अधिकतम पांच वर्षों के लिए आवंटित किया जाएगा, जिसे दो वर्षों तक बढ़ाया जा सकेगा।
नीति की अधिसूचना जारी होने की तिथि से पांच वर्षों तक आवंटन की शर्तें और शुल्क की दरें लागू रहेंगी। इसके बाद होने वाले किसी भी बदलाव का प्रभाव सभी एससीएन प्रदाताओं पर पड़ेगा, जिसमें मौजूदा प्रदाता भी शामिल हैं। ट्राई ने मोबाइल फोन को एल-बैंड और एस-बैंड स्पेक्ट्रम के माध्यम से सीधे उपग्रह से जोड़ने की सिफारिश की है।
इसके लिए दूरसंचार कंपनियां उपग्रह नेटवर्क प्रदाताओं से क्षमता लेकर अपने ग्राहकों को सेवाएं प्रदान कर सकेंगी। नियामक ने सरकार से स्मार्टफोन निर्माताओं को भारत में भविष्य में बिकने वाले उपकरणों में आवश्यक सैटकॉम मॉड्यूल लगाने के लिए प्रोत्साहन देने का भी अनुरोध किया है। स्थलीय मोबाइल स्पेक्ट्रम के माध्यम से उपग्रह से फोन संपर्क की अनुमति कुछ शर्तों के साथ देने की सिफारिश की गई है।
इसके लिए संबंधित मोबाइल स्पेक्ट्रम रखने वाले एक या अधिक दूरसंचार ऑपरेटरों की सहमति आवश्यक होगी। इन ऑपरेटरों के पास देश के सभी 22 लाइसेंस प्राप्त सेवा क्षेत्रों में संबंधित स्पेक्ट्रम होना चाहिए। ऐसी सेवाओं से मौजूदा सेवाओं में कोई हानिकारक व्यवधान नहीं होना चाहिए।
दूरसंचार नियामक ने कहा कि 2027 में होने वाले विश्व रेडियो संचार सम्मेलन के बाद सरकार द्वारा लिए गए निर्णय इन सेवाओं पर भी लागू होंगे। ट्राई ने एससीएन प्रदाताओं के लिए समायोजित सकल राजस्व का आठ प्रतिशत प्राधिकार शुल्क रखने की सिफारिश की है। इसके लिए न्यूनतम शुल्क की शर्त नहीं होगी।
प्रवेश शुल्क 37.5 लाख रुपये, प्रारंभिक बैंक गारंटी 45 लाख रुपये और न्यूनतम इक्विटी तथा नेटवर्थ 60-60 लाख रुपये रखने का प्रस्ताव है। इन सिफारिशों को दूरसंचार विभाग की मंजूरी मिलने पर सैटकॉम बाजार में नेटवर्क और सेवा प्रदाताओं की अलग-अलग भूमिकाएं निर्धारित होंगी। उपग्रह नेटवर्क प्रदाता बुनियादी ढांचा तैयार कर क्षमता बेचेंगे, जबकि जियो, एयरटेल और वोडाफोन आइडिया जैसी दूरसंचार कंपनियां इसका उपयोग ग्राहकों को सेवाएं देने के लिए करेंगी।
मौजूदा लाइसेंसधारक कंपनियां पात्रता शर्तें पूरी करने पर दोनों भूमिकाएं निभा सकेंगी।
