भारत की GDP वृद्धि पर विशेषज्ञों की राय: आंकड़ों का विश्लेषण
भारत की GDP वृद्धि पर बहस तेज
नई दिल्ली: भारत के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के हालिया आंकड़ों पर आर्थिक क्षेत्र में चर्चा बढ़ गई है। पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग ने इन आंकड़ों में बदलाव पर सवाल उठाए हैं। कांग्रेस ने भी गणना की विधि और महंगाई के प्रभाव को लेकर चिंता व्यक्त की है, जबकि सरकार ने इन आरोपों को खारिज किया है। इस बीच, अर्थशास्त्री मोंटेक सिंह अहलूवालिया, सुरजीत भल्ला और नीलकंठ मिश्रा ने इन आंकड़ों का विश्लेषण किया है।
नई और पुरानी GDP श्रृंखला की तुलना
नीलकंठ मिश्रा के अनुसार, नई और पुरानी GDP श्रृंखला के आंकड़ों की सीधी तुलना करना उचित नहीं है। नई श्रृंखला में विभिन्न स्रोतों, सर्वेक्षणों और गणना विधियों का उपयोग किया गया है। भारत में असंगठित क्षेत्र का हिस्सा बड़ा है, इसलिए समय-समय पर आधार वर्ष और आंकड़े जुटाने के तरीकों में बदलाव आवश्यक होता है। लगभग एक दशक बाद GDP श्रृंखला में बदलाव किया गया है, जिससे पुराने और नए आंकड़ों के बीच अंतर आना स्वाभाविक है।
उपभोग के आंकड़ों का महत्व
सुरजीत भल्ला ने GDP में राजनीतिक या जानबूझकर हेरफेर की संभावना को खारिज किया। उन्होंने बताया कि नई श्रृंखला में मौजूदा कीमतों पर GDP लगभग 4 प्रतिशत नीचे संशोधित की गई है। उनका तर्क है कि यदि GDP को जानबूझकर बढ़ाया जाता, तो उपभोग से जुड़े आंकड़ों में भी वृद्धि दिखाई देती, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। दूसरी ओर, निवेश में वृद्धि के स्वतंत्र संकेत मिले हैं, जो आर्थिक गतिविधियों को मिल रहे समर्थन को दर्शाते हैं।
वित्त वर्ष 2025-26 के आंकड़ों में बदलाव
मोंटेक सिंह अहलूवालिया ने कहा कि GDP के संशोधित आंकड़ों पर सवाल उठाना गलत नहीं है। हालांकि, विभिन्न श्रृंखलाओं के आंकड़ों को मिलाकर निष्कर्ष निकालना भी उचित नहीं होगा। नीलकंठ मिश्रा ने बताया कि पहले असंगठित क्षेत्र की वृद्धि का अनुमान कई बार संगठित क्षेत्र के प्रदर्शन के आधार पर लगाया जाता था, लेकिन नई गणना विधि में इसमें बदलाव किया गया है। सेवाओं के क्षेत्र, विशेषकर व्यापार और होटल से जुड़े आंकड़ों में लगभग 12 प्रतिशत संशोधन इसी बदलाव से संबंधित है।
7.8 प्रतिशत वृद्धि का अर्थव्यवस्था पर प्रभाव
पहली तिमाही में 7.8 प्रतिशत आर्थिक वृद्धि पर नीलकंठ मिश्रा ने कहा कि यह उनके वित्त वर्ष 2026-27 के लिए 7.5 प्रतिशत वृद्धि के अनुमान से बहुत भिन्न नहीं है। उनके अनुसार, वित्तीय और मौद्रिक दबाव कम होने से अर्थव्यवस्था को गति मिली है। वहीं, मोंटेक सिंह अहलूवालिया ने सावधानी बरतने की सलाह दी, यह कहते हुए कि सालाना वृद्धि लगभग 7 प्रतिशत रहने पर भी भारत कई बड़ी विकासशील अर्थव्यवस्थाओं से आगे रहेगा।
आंकड़ों पर सवाल उठाना आवश्यक
तीनों अर्थशास्त्रियों की चर्चा से यह स्पष्ट हुआ कि 7.8 प्रतिशत GDP वृद्धि को राजनीतिक तरीके से तैयार किए जाने का कोई ठोस प्रमाण नहीं मिला है। हालांकि, आंकड़ों में हुए संशोधन के कारणों को समझना आवश्यक है। अहलूवालिया ने सरकार से केवल सुधारों की घोषणा करने के बजाय उनके वास्तविक क्रियान्वयन पर ध्यान केंद्रित करने की बात कही। इसका मतलब है कि GDP के आंकड़े उत्साहजनक हैं, लेकिन केवल एक तिमाही की तेज वृद्धि के आधार पर अर्थव्यवस्था की पूरी तस्वीर तय करना जल्दबाजी होगी।
