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भारत की अर्थव्यवस्था के लिए 2026: एक निर्णायक मोड़

मुख्य आर्थिक सलाहकार वी. अनंत नागेश्वरन ने कहा है कि वर्ष 2026 भारत की अर्थव्यवस्था के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हो सकता है। उन्होंने मौजूदा चुनौतियों का उल्लेख करते हुए बताया कि ये केवल बाहरी दबावों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि विनिर्माण, ऊर्जा, कृषि और प्रौद्योगिकी में संरचनात्मक बाधाएँ भी शामिल हैं। नागेश्वरन ने 1991 के संकट की तुलना करते हुए कहा कि वर्तमान परिस्थितियाँ भिन्न हैं और आर्थिक रणनीति की समीक्षा की आवश्यकता है।
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मुख्य आर्थिक सलाहकार का दृष्टिकोण

वी. अनंत नागेश्वरन, जो मुख्य आर्थिक सलाहकार हैं, ने बृहस्पतिवार को बताया कि वर्ष 2026 भारत की अर्थव्यवस्था के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हो सकता है, जैसा कि 1991 में हुआ था। उन्होंने कहा कि मौजूदा चुनौतियाँ केवल बाहरी दबावों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि विनिर्माण, ऊर्जा, कृषि और प्रौद्योगिकी से जुड़ी संरचनात्मक बाधाएँ भी अर्थव्यवस्था पर प्रभाव डाल रही हैं। नागेश्वरन ने आईएसआईडी-आईडीआरए के राष्ट्रीय सम्मेलन में यह बात कही।


उन्होंने स्पष्ट किया कि 2026 की तुलना 1991 से करना यह नहीं दर्शाता कि दोनों वर्षों की परिस्थितियाँ समान हैं। 1991 में भारत भुगतान संतुलन संकट का सामना कर रहा था, जबकि वर्तमान में बाहरी दबावों के साथ-साथ घरेलू अर्थव्यवस्था की संरचनात्मक चुनौतियाँ भी मौजूद हैं। नागेश्वरन ने कहा कि 1991 का संकट चार दशकों में संचित समस्याओं का परिणाम था।


इसके विपरीत, 2026 में भारत एक ऐसे मोड़ पर है जहाँ बाहरी दबावों ने आर्थिक रणनीति की गहन समीक्षा की आवश्यकता पैदा कर दी है। उन्होंने कहा, '2026 में चुनौतियाँ केवल बाहरी नहीं हैं। विनिर्माण, ऊर्जा, कृषि और प्रौद्योगिकी में संरचनात्मक बाधाएँ भी दबाव बढ़ा रही हैं।'


नागेश्वरन ने यह भी कहा कि अब सबसे गंभीर झटके प्राकृतिक घटनाओं के कारण नहीं, बल्कि सुनियोजित कदमों से आ सकते हैं। उन्होंने चीन द्वारा सुरंग खोदने वाली मशीनों और बुनियादी ढांचे से संबंधित उत्पादों के निर्यात के लिए लाइसेंस व्यवस्था लागू करने का उल्लेख किया, यह बताते हुए कि भारत को भी ऐसे उत्पादों की आवश्यकता होगी।


उन्होंने कहा कि आपूर्ति पर निर्भरता को दबाव बनाने के हथियार के रूप में इस्तेमाल करने का प्रभाव समय के साथ कम हो सकता है, लेकिन प्रारंभ में इसका प्रभाव गंभीर होता है।


नागेश्वरन ने बताया कि महामारी से पहले और आने वाले 20-30 वर्षों की आर्थिक परिस्थितियों में बड़ा अंतर होगा। पहले के अधिकांश आर्थिक संकट मांग की कमी से जुड़े थे, जिससे केंद्रीय बैंक ब्याज दरें घटाकर और सरकारें राजकोषीय प्रोत्साहन देकर अर्थव्यवस्था को सहारा दे सकती थीं।


उन्होंने विभिन्न आर्थिक संकटों का उदाहरण देते हुए कहा कि इनसे निपटने के लिए कम ब्याज दरें, नकदी बढ़ाना और राजकोषीय प्रोत्साहन जैसे कदम उठाए गए थे। उन्होंने कहा कि मांग की कमी होने पर अर्थव्यवस्था को प्रोत्साहित करना अपेक्षाकृत आसान होता है, जबकि आपूर्ति की कमी होने पर वास्तविक वस्तुओं और उत्पादन की उपलब्धता एक चुनौती बन जाती है।


नागेश्वरन ने भविष्यवाणी की कि अगले 30 वर्षों में आपूर्ति की कमी से उत्पादन और महंगाई पर प्रभाव डालने के बीच मौद्रिक नीति लागू करना अधिक कठिन होगा। साथ ही, कमजोर आर्थिक गतिविधियों को प्रोत्साहित करने के लिए राजकोषीय नीति की भूमिका महत्वपूर्ण बनी रहेगी।