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भारत की कंपनियों पर अमेरिका-ईरान संघर्ष का सीमित प्रभाव: क्रिसिल की रिपोर्ट

क्रिसिल की एक नई रिपोर्ट में बताया गया है कि अमेरिका-ईरान के बीच युद्धविराम से भारतीय कंपनियों पर पड़ने वाला प्रभाव पहले की अपेक्षा कम होगा। रिपोर्ट के अनुसार, वित्त वर्ष 2026-27 में परिचालन मुनाफे में केवल एक प्रतिशत की कमी की संभावना है। कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट और गैस आपूर्ति में सुधार से अधिकांश उद्योगों को राहत मिलेगी। हालांकि, भू-राजनीतिक जोखिम और अल नीनो जैसी स्थितियों के कारण सतर्कता बनाए रखने की सलाह दी गई है।
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संघर्ष का प्रभाव

अमेरिका और ईरान के बीच युद्धविराम के चलते ऊर्जा आपूर्ति में सुधार होने से पश्चिम एशिया के संघर्ष का भारतीय कंपनियों पर पड़ने वाला प्रभाव पहले की अपेक्षा कम होगा। रेटिंग एजेंसी क्रिसिल रेटिंग्स ने इस बात की जानकारी दी है।


एजेंसी का अनुमान है कि यह संघर्ष वित्त वर्ष 2026-27 में भारतीय कंपनियों के परिचालन मुनाफे में लगभग एक प्रतिशत की कमी लाएगा। पहले, लंबे समय तक संघर्ष जारी रहने की स्थिति में दो प्रतिशत की गिरावट का अनुमान लगाया गया था।


कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट

यह संशोधित अनुमान तब आया है जब अमेरिका-ईरान के बीच हुए नाजुक समझौते के बाद होर्मुज जलडमरूमध्य फिर से खुल गया है, जिससे कच्चे तेल की कीमतों में तेज गिरावट आई है। हालांकि, क्रिसिल ने चेतावनी दी है कि भू-राजनीतिक जोखिम अभी भी मौजूद हैं और गैस आपूर्ति को सामान्य होने में समय लग सकता है।


क्षेत्रीय प्रभाव

क्रिसिल रेटिंग्स के प्रबंध निदेशक सुबोध राय ने कहा कि यदि युद्धविराम बना रहता है, तो उनके आकलन के अनुसार 34 क्षेत्रों में से दो-तिहाई पर न्यूनतम प्रभाव पड़ेगा। पहली छमाही में दबाव की भरपाई दूसरी छमाही में मुनाफे में सुधार से हो जाएगी। हालांकि, संघर्ष बढ़ने का खतरा बना हुआ है।


क्रिसिल के आकलन में यह भी पाया गया कि चालू वित्त वर्ष में ब्रेंट कच्चे तेल का औसत मूल्य 80-85 डॉलर प्रति बैरल रहने की संभावना है।


उद्योगों पर प्रभाव

संशोधित परिदृश्य में केवल 10 क्षेत्रों की लाभप्रदता में महत्वपूर्ण गिरावट की आशंका है, जबकि पहले के तनावपूर्ण परिदृश्य में 22 क्षेत्रों पर असर का अनुमान था। विमानन, सिरेमिक, फ्लेक्सिबल पैकेजिंग, विशेष रसायन, पॉलिएस्टर वस्त्र और हीरा पॉलिश जैसे क्षेत्रों पर दबाव बना रह सकता है।


एजेंसी ने कहा कि कच्चे तेल की कम कीमतें और गैस की उपलब्धता में सुधार से अधिकांश उद्योगों को राहत मिलेगी।


सरकारी उपाय और जोखिम

तेल विपणन कंपनियां और उर्वरक निर्माता ऊर्जा कीमतों में नरमी के सबसे बड़े लाभार्थियों में से हो सकते हैं। क्रिसिल का अनुमान है कि मार्च और मई के बीच सरकारी ईंधन खुदरा विक्रेताओं को 40,000-45,000 करोड़ रुपये की शुद्ध कम वसूली का सामना करना पड़ा।


हालांकि, कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट के साथ चालू वित्त वर्ष में उनके फिर से परिचालन लाभ में लौटने की उम्मीद है।


क्रिसिल ने दो प्रमुख जोखिमों की ओर भी इशारा किया है: पहला, अमेरिका-ईरान के बीच का अंतरिम समझौता, और दूसरा, अल नीनो की स्थिति, जिससे मानसून कमजोर पड़ सकता है।


भविष्य की संभावनाएं

क्रिसिल रेटिंग्स के वरिष्ठ निदेशक सोमशेखर वेमुरी ने कहा कि कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट और गैस आपूर्ति से जुड़े दबाव में कमी से भारतीय कंपनियों को राहत मिली है। हालांकि, पश्चिम एशिया की भू-राजनीतिक स्थिति अभी भी अस्थिर है।


उन्होंने कहा कि कच्चे तेल की कीमतों में नरमी सरकार को पूंजीगत व्यय जारी रखने में मदद करेगी।