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भारत की ब्रिक्स अध्यक्षता: वैश्विक चुनौतियों के बीच संतुलन बनाने की आवश्यकता

भारत की ब्रिक्स अध्यक्षता इस समय वैश्विक राजनीति की जटिलताओं के बीच हो रही है। पूर्व G-20 शेरपा अमिताभ कांत ने भारत को संतुलित और परिपक्व भूमिका निभाने की सलाह दी है। इस लेख में, हम जानेंगे कि कैसे भारत को विभिन्न देशों के बीच सहमति स्थापित करनी है और अपनी आर्थिक प्राथमिकताओं को आगे बढ़ाना है। ब्रिक्स के शिखर सम्मेलन में प्रमुख नेताओं की भागीदारी और भू-राजनीतिक चुनौतियों का सामना करते हुए भारत की भूमिका पर भी चर्चा की गई है।
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भारत की ब्रिक्स अध्यक्षता का संदर्भ

इस बार भारत की ब्रिक्स अध्यक्षता ऐसे समय में हो रही है जब वैश्विक राजनीति जटिल हो गई है। यूरोप और पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष, वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में बाधाएं और प्रमुख देशों की बढ़ती संरक्षणवादी नीतियां भारत के लिए नई चुनौतियाँ पेश कर रही हैं। इस संदर्भ में, पूर्व G-20 शेरपा अमिताभ कांत ने भारत को ब्रिक्स में एक संतुलित और परिपक्व भूमिका निभाने की सलाह दी है।


भारत की भूमिका और प्राथमिकताएँ

अमिताभ कांत ने इंडिया टुडे के साथ बातचीत में कहा कि भारत को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि ब्रिक्स का अंतिम दस्तावेज पश्चिम विरोधी न लगे। उनके अनुसार, भारत की अध्यक्षता का मुख्य उद्देश्य विभिन्न देशों के बीच सहमति स्थापित करना होना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि भारत को अपने राष्ट्रीय हितों और 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए अमेरिका, यूरोप और चीन के साथ सहयोग करना चाहिए।


ब्रिक्स की प्रासंगिकता

कांत ने ब्रिक्स को अप्रासंगिक मानने वाली आलोचनाओं को खारिज किया। उनका कहना है कि यह समूह भू-राजनीतिक और आर्थिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण बना हुआ है। विस्तारित ब्रिक्स में अब 11 सदस्य हैं, जिनका वैश्विक अर्थव्यवस्था में लगभग 40 प्रतिशत और वैश्विक व्यापार में एक चौथाई हिस्सा है।


ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की चुनौतियाँ

भारत की अध्यक्षता के दौरान ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग, ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन, रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति सिरिल रामाफोसा जैसे प्रमुख नेताओं के शामिल होने की संभावना है। ऐसे में विभिन्न हितों वाले देशों को एक मंच पर लाना भारत के लिए चुनौतीपूर्ण होगा।


सहमति और संतुलन की आवश्यकता

अमिताभ कांत ने कहा कि बहुपक्षीय व्यवस्था का आधार सहमति है, और भारत को अपनी अध्यक्षता में इस सिद्धांत को आगे बढ़ाना चाहिए। उनका मानना है कि भारत को किसी एक खेमे में शामिल होने के बजाय सभी प्रमुख शक्तियों के साथ संतुलित संबंध बनाए रखने चाहिए। उन्होंने इसे बहु-संरेखण नीति के रूप में वर्णित किया, जिसमें राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता दी जाती है।


भविष्य की दिशा

भारत की ब्रिक्स अध्यक्षता ऐसे समय में हो रही है जब अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी ब्रिक्स को लेकर संदेह व्यक्त किया है। इसके अलावा, पश्चिम एशिया का संघर्ष भी समूह के भीतर मतभेदों को बढ़ा सकता है। कांत ने सुझाव दिया कि भारत को ब्रिक्स के एजेंडे को भू-राजनीतिक विवादों से दूर रखना चाहिए और व्यापार, निवेश, विकास और जलवायु परिवर्तन जैसे मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।


भारत की वैश्विक भूमिका

भारत के लिए ब्रिक्स केवल एक कूटनीतिक मंच नहीं है, बल्कि यह बदलती वैश्विक अर्थव्यवस्था में अपनी भूमिका को मजबूत करने का एक अवसर भी है। अध्यक्षता के दौरान भारत की सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि वह विभिन्न शक्तियों के बीच संतुलन बनाए रखते हुए अपनी आर्थिक और रणनीतिक प्राथमिकताओं को आगे बढ़ाए और ब्रिक्स को सहयोग का मंच बनाए रखे।