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भारत की सांख्यिकी व्यवस्था में सुधार के लिए 4,371 करोड़ रुपये की योजना

केंद्रीय मंत्रिमंडल ने देश की सांख्यिकी व्यवस्था को सुधारने के लिए 4,371 करोड़ रुपये की योजना को मंजूरी दी है। यह योजना, जिसे ‘विस्तार’ कहा जाता है, अगले पांच वर्षों में लागू होगी। इसका उद्देश्य आंकड़ों की गुणवत्ता में सुधार करना और नीतिगत आवश्यकताओं के अनुसार संसाधनों का बेहतर आवंटन करना है। जानें इस योजना के प्रमुख पहलुओं और इसके संभावित प्रभावों के बारे में।
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सांख्यिकी व्यवस्था में बदलाव की नई पहल

नई दिल्ली, चार नवंबर: केंद्रीय मंत्रिमंडल ने देश की आधिकारिक सांख्यिकी प्रणाली को आधुनिक बनाने के लिए 4,371.1 करोड़ रुपये की योजना को मंजूरी दी है। यह योजना, जिसे ‘सांख्यिकीय बदलाव, विश्लेषण और अनुसंधान के लिए विकसित भारत पहल’ (विस्तार) कहा जाता है, अगले पांच वर्षों तक यानी 2030-31 तक लागू रहेगी। यह निर्णय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अध्यक्षता में हुई मंत्रिमंडल की बैठक में लिया गया।


सूचना एवं प्रसारण मंत्री अश्विनी वैष्णव ने बताया कि ‘विस्तार’ योजना का मुख्य उद्देश्य देश की सांख्यिकी प्रणाली में व्यापक बदलाव लाना है। इससे आंकड़ों की गुणवत्ता में सुधार होगा। एक आधिकारिक विज्ञप्ति के अनुसार, विकसित भारत-2047 के लक्ष्यों के अनुरूप, इस योजना के तहत एक गतिशील और वास्तविक समय पर आधारित आधिकारिक सांख्यिकी ढांचा तैयार किया जाएगा।


इसका मुख्य उद्देश्य समय पर आंकड़े उपलब्ध कराना, विस्तृत आंकड़े एकत्र करना, समरूप आंकड़ा समूहों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करना और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) के उपयोग के लिए उपयुक्त आंकड़ा आधार तैयार करना है। ‘विस्तार’ योजना नीतिगत आवश्यकताओं के अनुसार संसाधनों के त्वरित और बेहतर आवंटन में मदद करेगी। इससे बड़े पैमाने पर सर्वेक्षण, अनुसंधान विधियों का विकास, डिजिटल परिवर्तन और राष्ट्रीय आंकड़ा प्रबंधन के लिए समग्र दृष्टिकोण अपनाने में सहायता मिलेगी।


इस योजना के तीन प्रमुख पहलू हैं: व्यापक सांख्यिकीय गतिविधियों और व्यवस्था का सुदृढ़ीकरण, सांख्यिकी को मजबूत करने के लिए सहायता (एसएसएस), और आर्थिक गणना (ईसी)। आर्थिक गणना के अंतर्गत, सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के सहयोग से आठवीं आर्थिक गणना का आयोजन करेगा। आर्थिक गणना के आंकड़े राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर योजनाकारों और नीति निर्माताओं के लिए महत्वपूर्ण होते हैं।


इससे असंगठित क्षेत्र के योगदान का सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में आकलन करने का मार्ग भी प्रशस्त होगा।