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भारत के वाहन कलपुर्जा उद्योग में 98,000 करोड़ रुपये की पूंजी फंसी

भारत के वाहन कलपुर्जा उद्योग में लगभग 98,000 करोड़ रुपये की पूंजी भंडार में फंसी हुई है। एक नई रिपोर्ट के अनुसार, यदि भंडार का प्रबंधन बेहतर किया जाए, तो 29,000 से 39,000 करोड़ रुपये की पूंजी को मुक्त किया जा सकता है। एमएसएमई क्षेत्र की महत्वपूर्ण भूमिका और उत्पादकता में सुधार की संभावनाओं पर भी चर्चा की गई है। जानें इस उद्योग की वर्तमान स्थिति और भविष्य की संभावनाएं।
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वाहन कलपुर्जा उद्योग की पूंजी का संकट

नई दिल्ली, 5 सितंबर: भारत के वाहन कलपुर्जा क्षेत्र में लगभग 98,000 करोड़ रुपये की पूंजी माल के भंडार में अटकी हुई है। यदि भंडार का प्रबंधन बेहतर तरीके से किया जाए, तो इसमें से 29,000 से 39,000 करोड़ रुपये की पूंजी को मुक्त किया जा सकता है। यह जानकारी वेक्टर कंसल्टिंग ग्रुप की एक रिपोर्ट में दी गई है।


रिपोर्ट के अनुसार, संभावित रूप से मुक्त होने वाली कार्यशील पूंजी में से 4,000 से 5,600 करोड़ रुपये सूक्ष्म, लघु एवं मझोले उद्यमों (एमएसएमई) से आ सकते हैं। देश में वाहन कलपुर्जा निर्माताओं में लगभग 80 प्रतिशत हिस्सेदारी एमएसएमई की है। वेक्टर कंसल्टिंग ग्रुप की रिपोर्ट ‘द ब्रोकन फ्लाईव्हील: बिल्डिंग ए फ्यूचर-रेडी ऑटोमोटिव सप्लाई इकोसिस्टम’ में कहा गया है कि माल खत्म होने के बाद खपत के आधार पर पुनः आपूर्ति करने वाली कंपनियां आमतौर पर अपने भंडार में फंसी पूंजी में 30 से 40 प्रतिशत तक की कमी कर पाती हैं।


यह अध्ययन उद्योग के 21 वरिष्ठ अधिकारियों के बीच किया गया था, जिसमें आंकड़े जुलाई से अगस्त 2026 के बीच एकत्रित किए गए। अध्ययन में यह भी अनुमान लगाया गया है कि भारत के वाहन कलपुर्जा क्षेत्र में एमएसएमई कंपनियों का कुल कारोबार लगभग 2.4 से 2.9 लाख करोड़ रुपये है।


इस क्षेत्र में उत्पादकता में 30 प्रतिशत सुधार से सालाना 74,000 से 88,000 करोड़ रुपये का अतिरिक्त कारोबार प्राप्त किया जा सकता है। भारतीय कलपुर्जा विनिर्माता संघ (एसीएमए) के 66वें वार्षिक सत्र में प्रस्तुत वेक्टर के अध्ययन में पाया गया कि सर्वेक्षण में शामिल 95 प्रतिशत उद्योग प्रमुखों का मानना है कि एमएसएमई भविष्य की वृद्धि के लिए आवश्यक क्षमताओं में पर्याप्त तेजी से निवेश नहीं कर रहे हैं। रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया कि कारखाने औसतन 75 से 85 प्रतिशत क्षमता पर कार्य कर रहे हैं, जबकि सर्वेक्षण में शामिल 91 प्रतिशत लोगों ने क्षमता को एक बड़ी चुनौती माना।


वेक्टर कंसल्टिंग ग्रुप के प्रबंध साझेदार रवींद्र पाटकी ने कहा, “यह अवसर केवल उत्पादन क्षमता बढ़ाने तक सीमित नहीं है। भारतीय कंपनियों के पास पहले से मौजूद क्षमता का एक बड़ा हिस्सा उत्पादन के लिए उपयोग नहीं हो रहा है।” उन्होंने यह भी कहा कि परिचालन में फंसी पूंजी को मुक्त करना, मौजूदा कारोबार की आर्थिक स्थिति में सुधार करना और फिर अतिरिक्त धन को क्षमताओं में निवेश करना यह तय करेगा कि भारतीय आपूर्तिकर्ता भविष्य के वाहन उद्योग मूल्य श्रृंखला में किस तरह आगे बढ़ेंगे।