भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में अभूतपूर्व वृद्धि: रिजर्व बैंक की सफल योजनाएं
रिजर्व बैंक की विशेष योजनाओं के तहत भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है, जिससे रुपये की स्थिति मजबूत हुई है। इस लेख में जानें कि कैसे 136.38 अरब डॉलर का विदेशी धन आया और इसके पीछे के कारण क्या हैं। साथ ही, भविष्य में आने वाली चुनौतियों और रिजर्व बैंक की रणनीतियों पर भी चर्चा की गई है।
| Sep 3, 2026, 23:03 IST
रिजर्व बैंक की योजनाओं का प्रभाव
भारत के विदेशी मुद्रा भंडार को सुदृढ़ करने के लिए रिजर्व बैंक द्वारा उठाए गए विशेष कदम अपेक्षा से कहीं अधिक सफल रहे हैं। बुधवार को केंद्रीय बैंक द्वारा साझा की गई जानकारी के अनुसार, इन पहलों के माध्यम से देश में कुल 136.38 अरब डॉलर का विदेशी धन प्राप्त हुआ है। इस बड़ी राशि के आगमन से भारत की विदेशी मुद्रा स्थिति में सुधार हुआ है और बाहरी आर्थिक झटकों के समय रुपये को संभालने की क्षमता में वृद्धि हुई है।
आर्थिक दबाव और उपायों की आवश्यकता
यह ध्यान देने योग्य है कि इन उपायों की घोषणा जून में की गई थी, जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि और अमेरिका-ईरान संघर्ष के कारण भारत के आयात खर्च पर दबाव बढ़ रहा था। ऐसी स्थिति में देश के भुगतान संतुलन पर नकारात्मक प्रभाव पड़ने की आशंका थी। रिजर्व बैंक का उद्देश्य विदेशों में रहने वाले भारतीयों और अन्य स्रोतों से स्थिर डॉलर प्रवाह को बढ़ाना था।
विदेशी मुद्रा जमा योजना से धन की प्राप्ति
हालिया जानकारी के अनुसार, सबसे अधिक धन विदेशों में रहने वाले भारतीयों के लिए शुरू की गई विदेशी मुद्रा जमा योजना के माध्यम से आया। इस योजना से अर्थशास्त्रियों ने 80 से 90 अरब डॉलर की उम्मीद की थी, लेकिन वास्तविक राशि इससे कहीं अधिक रही। भारतीय बैंकों ने अनिवासी विदेशी मुद्रा जमा के जरिए 127.23 अरब डॉलर जुटाए। इसके अतिरिक्त, बाहरी वाणिज्यिक ऋण के माध्यम से 3.89 अरब डॉलर और विदेशों से अन्य ऋणों के जरिए 5.26 अरब डॉलर प्राप्त हुए हैं।
अतीत से सबक
भारत ने आर्थिक दबाव के समय में पहले भी विदेशों में रहने वाले अपने नागरिकों से डॉलर जुटाने की कोशिश की है। वर्ष 2013 में शुरू की गई एक योजना से लगभग 26 अरब डॉलर जुटाए गए थे। इस बार बड़े स्तर पर धन आने के कारण रिजर्व बैंक को रुपये में अचानक उतार-चढ़ाव से निपटने के लिए अतिरिक्त ताकत मिली है।
विशेष योजना का समापन
एशिया मामलों के रणनीतिकार विवेक राजपाल के अनुसार, इस बार आया धन अनुमान से कहीं अधिक है। इससे रुपये की स्थिति और बाजार में उतार-चढ़ाव को नियंत्रित करने की रिजर्व बैंक की क्षमता में विश्वास बढ़ता है। उनका मानना है कि इसी मजबूत प्रतिक्रिया के कारण केंद्रीय बैंक ने विदेशी मुद्रा जमा योजना को निर्धारित समय से पहले बंद करने का निर्णय लिया।
भंडार में वृद्धि
यह योजना पहले सितंबर के अंत तक चलने वाली थी, लेकिन भारी मात्रा में धन आने के बाद इसे 31 अगस्त को ही समाप्त कर दिया गया। हालांकि, बैंकों को विदेशों से धन जुटाने की एक अलग सुविधा अब भी उपलब्ध है। इन डॉलर का सीधा लाभ देश के विदेशी मुद्रा भंडार को मिला है। बैंकों द्वारा जुटाई गई विदेशी मुद्रा को रिजर्व बैंक के साथ विनिमय किया जाता है, जिससे भंडार में वृद्धि होती है। 21 अगस्त को समाप्त सप्ताह में भारत का विदेशी मुद्रा भंडार बढ़कर रिकॉर्ड 729.33 अरब डॉलर पहुंच गया था।
भविष्य की चुनौतियाँ
यह स्थिति महत्वपूर्ण है, खासकर जब महंगा कच्चा तेल और अमेरिकी सरकारी बांड पर बढ़ती ब्याज दरें रुपये पर दबाव डाल सकती हैं। बाजार में चर्चा है कि रिजर्व बैंक हाल के दिनों में रुपये को सहारा देने के लिए डॉलर की बिक्री बढ़ा रहा है। हालांकि, इस बड़ी राशि का एक दूसरा पहलू भी है। जिन विदेशी मुद्राओं को अभी जुटाया गया है, उन्हें भविष्य में वापस करना होगा। इसका मतलब है कि मौजूदा समय में भंडार मजबूत हुआ है, लेकिन आगे चलकर रिजर्व बैंक पर भुगतान की जिम्मेदारी भी बढ़ेगी। जुलाई में केंद्रीय बैंक की विदेशी मुद्रा वायदा देनदारी बढ़कर रिकॉर्ड 136.7 अरब डॉलर पहुंच गई थी।
बैंकिंग प्रणाली में नकदी का दबाव
मैक्वायरी के अनुसार, इन पैसों से वित्तीय मदद मिली है, लेकिन यदि इस तरह का धन लगातार और बिना सीमा के जुटाया जाता है, तो भविष्य में एक साथ बड़ी रकम लौटाने का दबाव बन सकता है, जिससे रुपये में अस्थिरता बढ़ने का खतरा हो सकता है। दूसरी चिंता बैंकिंग व्यवस्था में बढ़ती नकदी को लेकर है। विदेशी डॉलर को रुपये में बदलने पर बैंकिंग प्रणाली में बड़ी मात्रा में रुपये की अतिरिक्त नकदी पहुंचती है। अर्थशास्त्री सिद्धार्थ कोठारी के अनुसार, पहले से ही बैंकों के पास अतिरिक्त नकदी मौजूद है। ऐसे में रिजर्व बैंक को इस अतिरिक्त राशि का कुछ हिस्सा वापस खींचना पड़ सकता है, ताकि महंगाई पर दबाव न बढ़े।
भविष्य की रणनीतियाँ
इसके लिए नकद आरक्षित अनुपात में अस्थायी या स्थायी बदलाव जैसे कदम उठाए जा सकते हैं। हालांकि, विशेष विदेशी मुद्रा जमा योजना के तहत जुटाई गई रकम को सामान्य नकद आरक्षित नियमों से छूट दी गई थी। ऐसे में आने वाले समय में रिजर्व बैंक के सामने चुनौती यह होगी कि मजबूत विदेशी मुद्रा भंडार और बैंकिंग व्यवस्था में संतुलित नकदी के बीच सही तालमेल बनाए रखा जाए।
