भारत के शेयर बाजार की स्थिति: एक गंभीर विश्लेषण
शेयर बाजार की जटिलताएँ
ओह, रामावतारजी! उनकी उम्र इक्यासी वर्ष है, लेकिन उनकी आदतें वही हैं - दिन में चैन तब तक नहीं आता जब तक कुछ शेयर न खरीद लें या न बेच दें। सुबह से लेकर शाम तक, जब तक शेयर बाजार खुला रहता है, उनका मन और मस्तिष्क हमेशा सक्रिय रहते हैं। वे शास्त्री, इंदिरा और देसाई के समय के चार टर्म के सांसद आरआर मुरारका के साथ रहे हैं और लुटियंस दिल्ली की धड़कनों के गवाह रहे हैं। देवगौड़ा के प्रधानमंत्री रहते हुए, वे उनके करीबी सहयोगी रहे। मैंने उनके बारे में गपशप कॉलम में कई बार लिखा है। मुझे लगता है कि धीरूभाई अंबानी, कोलकाता के मारवाड़ियों और लुटियंस दिल्ली के कई महत्वपूर्ण चेहरों के साथ रामावतारजी की जानकारी अद्वितीय है।
भारत में कभी राजनीति और लोकतंत्र में जीवंतता थी। नेहरू, इंदिरा, वाजपेयी और मनमोहन सिंह सभी ने एक-दूसरे के प्रति सम्मान दिखाया। अब नरेंद्र मोदी का समय है, जहां सब कुछ एक ही हाथ में है। यह एक सिंगल विंडो सिस्टम है, जिसमें अडानी, अंबानी और अन्य खरबपतियों की सीधी पहुंच है।
प्रधानमंत्री मोदी के कथित गुजरात मॉडल ने भारत के पूंजी बाजार को 2026 में एक ऐसी स्थिति में पहुंचा दिया है, जो टीबी के मरीज की तरह है। बाहरी रूप से सब कुछ ठीक दिखता है, लेकिन अंदर से स्थिति गंभीर है। शेयर बाजार में गिरावट, रुपया कमजोर होना और विदेशी निवेशकों का भागना इस बात का संकेत है कि अर्थव्यवस्था में कुछ गड़बड़ है।
रामावतारजी का फोन आता है, और मैं सोचता हूं कि आज क्या कहना है। वे मुझे लुटियंस दिल्ली और अर्थव्यवस्था का भविष्यवक्ता मानते हैं। पिछले कुछ वर्षों में, उन्होंने मेरे लेखों को पढ़कर अपने ज्ञान को बढ़ाया है।
मैंने पहले भी लिखा था कि रूस-यूक्रेन युद्ध का असर भारत की अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा। अब वही हो रहा है। रामावतारजी बार-बार पूछते हैं कि आगे क्या होगा, और मैं उन्हें बताता हूं कि कुछ भी निश्चित नहीं है।
भारत के करोड़ों निवेशकों की नजरें शेयर बाजार पर टिकी रहती हैं। हाल ही में सेंसेक्स में भारी गिरावट आई, जिससे निवेशकों की संपत्ति में कमी आई। ब्रेंट क्रूड की कीमतें बढ़ रही हैं, और रुपया कमजोर हो रहा है।
शेयर बाजार की बीमारी पुरानी है। जनवरी 2026 में सेंसेक्स 85,762 पर था, लेकिन अब यह 74,000 के आसपास है। इस साल सेंसेक्स में 12 प्रतिशत की गिरावट आई है।
इस युद्ध ने भारत की अर्थव्यवस्था की कमजोरियों को उजागर किया है। विदेशी निवेशकों की हिस्सेदारी घटकर 15.8 प्रतिशत रह गई है, जो 17 वर्षों में सबसे कम है।
जबकि मोदीजी भारत की प्रगति का ढोल पीट रहे हैं, विदेशी फंड मैनेजर भारत को कमजोर मानकर पैसा अन्य देशों में ले जा रहे हैं।
भारत का शेयर बाजार फिर भी चल रहा है, क्योंकि भारतीय परिवारों की बचत इसमें योगदान दे रही है। हर महीने वे म्यूचुअल फंड में निवेश कर रहे हैं।
इस प्रकार, भारत की अर्थव्यवस्था की वास्तविकता और शेयर बाजार की स्थिति के बीच एक बड़ा अंतर है।
