भारत में ईंधन मांग में गिरावट: वैश्विक ऊर्जा बाजार का प्रभाव
भारत में ईंधन मांग में कमी का कारण
वैश्विक ऊर्जा बाजार में चल रही उथल-पुथल का प्रभाव अब भारत में भी स्पष्ट रूप से देखा जा रहा है। कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें, आपूर्ति संबंधी चिंताएं और महंगाई के दबाव के चलते कई अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों ने भारत में पेट्रोल और डीजल की मांग में वृद्धि के पूर्वानुमान को काफी कम कर दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि वर्तमान स्थिति लंबे समय तक बनी रही, तो इस वर्ष ईंधन की खपत में वृद्धि कोविड महामारी के बाद के सबसे कमजोर स्तर पर पहुंच सकती है.
भारत का कच्चे तेल का आयात
भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा कच्चे तेल का आयातक है, और देश अपनी आवश्यकताओं का अधिकांश कच्चा तेल विदेशों से खरीदता है। इस प्रकार, अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों में वृद्धि और आपूर्ति संकट का सीधा असर घरेलू अर्थव्यवस्था पर पड़ता है.
पेट्रोलियम उत्पादों की मांग में कमी
हाल ही में ऊर्जा बाजार का अध्ययन करने वाली संस्था क्लेपर ने भारत में परिष्कृत पेट्रोलियम उत्पादों की मांग में वृद्धि के अपने पूर्वानुमान में लगभग 39 प्रतिशत की कमी की है। पहले जहां इस वर्ष मांग में प्रतिदिन लगभग 1.28 लाख बैरल की वृद्धि का अनुमान था, अब इसे घटाकर करीब 78 हजार बैरल प्रतिदिन कर दिया गया है.
पेट्रोल और डीजल की मांग में गिरावट
पेट्रोल की मांग में वृद्धि का अनुमान भी लगभग 40 प्रतिशत घटाया गया है। पहले जहां 63 हजार बैरल प्रतिदिन की वृद्धि की संभावना थी, अब यह अनुमान करीब 38 हजार बैरल प्रतिदिन रह गया है। इसी तरह, डीजल की मांग वृद्धि का अनुमान भी लगभग 30 प्रतिशत घटाकर 42 हजार बैरल प्रतिदिन कर दिया गया है.
सरकारी नीतियों का प्रभाव
विशेषज्ञ एलिफ बिनिची के अनुसार, कच्चे तेल के आयात पर बढ़ती लागत, रुपये की कमजोरी और सरकारी तेल विपणन कंपनियों पर बढ़ते वित्तीय दबाव के कारण सरकार ईंधन बचत से जुड़े संदेशों और खर्च में संयम को बढ़ावा दे रही है। इसका असर परिवहन क्षेत्र में ईंधन खपत की वृद्धि पर पड़ सकता है.
डिजल की मांग में भारी कटौती
ऊर्जा अनुसंधान संस्था रिस्टैड एनर्जी ने भी भारत में डीजल की मांग वृद्धि के अनुमान में भारी कटौती की है। संस्था का मानना है कि डीजल खपत में वृद्धि अब केवल 4 से 5 हजार बैरल प्रतिदिन रह सकती है, जबकि पहले यह अनुमान 50 से 60 हजार बैरल प्रतिदिन के बीच था.
आर्थिक गतिविधियों पर प्रभाव
डिजल भारत की अर्थव्यवस्था के लिए एक महत्वपूर्ण ईंधन है, जिसका उपयोग माल परिवहन, कृषि कार्य, निर्माण गतिविधियों और औद्योगिक संचालन में होता है। इसकी मांग में कमी आर्थिक गतिविधियों की गति को प्रभावित कर सकती है.
महंगाई पर असर
बढ़ती ईंधन कीमतों का असर महंगाई पर भी पड़ सकता है। परिवहन लागत में वृद्धि से खाद्य पदार्थों और अन्य आवश्यक वस्तुओं की कीमतों में बढ़ोतरी की आशंका है, साथ ही सरकार के राजकोषीय संतुलन और चालू खाते पर भी दबाव बढ़ सकता है.
भारत की स्थिति
हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि भारत की स्थिति चीन जैसी नहीं है। चीन में सड़क परिवहन ईंधन की मांग में दीर्घकालिक गिरावट के संकेत पहले से दिखाई दे रहे थे, जबकि भारत में मौजूदा कमजोरी को अस्थायी माना जा रहा है। उनका मानना है कि यदि पश्चिम एशिया में तनाव कम होता है और तेल आपूर्ति सामान्य होती है, तो भारत में ईंधन की मांग फिर से मजबूत हो सकती है.
