भारत में कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि का असर: महंगाई और आयात बिल पर दबाव
कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि
नई दिल्ली, 8 सितंबर: पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंच गई हैं। इससे भारत के तेल आयात बिल, रुपये की वैल्यू और महंगाई पर नकारात्मक प्रभाव पड़ने की संभावना है। अंतरराष्ट्रीय मानक ब्रेंट क्रूड का वायदा मूल्य 2% से अधिक बढ़कर लगभग 99 डॉलर प्रति बैरल हो गया है, जबकि अमेरिकी वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) की कीमत लगभग 3% बढ़कर 94 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई है। भारत, जो दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा कच्चा तेल आयातक है, अपनी आवश्यकताओं का 88% से अधिक कच्चा तेल आयात करता है।
आयात बिल और महंगाई पर प्रभाव
अंतरराष्ट्रीय कीमतों में स्थायी वृद्धि से भारत का डॉलर में आयात बिल बढ़ सकता है, जिससे व्यापार संतुलन और रुपये पर दबाव बढ़ेगा। कच्चे तेल की ऊंची कीमतों का असर ईंधन, परिवहन और अन्य ऊर्जा लागत के माध्यम से घरेलू महंगाई पर भी पड़ेगा। पेट्रोलियम मंत्रालय के पेट्रोलियम नियोजन एवं विश्लेषण प्रकोष्ठ (PPAC) के अनुसार, अप्रैल से जुलाई के बीच भारत का कच्चे तेल का आयात बिल 56% बढ़कर 63.4 अरब डॉलर हो गया, जो पिछले वर्ष की समान अवधि में 40.5 अरब डॉलर था।
कच्चे तेल की औसत कीमतों में वृद्धि
PPAC के आंकड़ों के अनुसार, सितंबर में भारत के कच्चे तेल के आयात की औसत कीमत 100.75 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई है, जो अगस्त में 90.19 डॉलर और जुलाई में 82.04 डॉलर प्रति बैरल थी। 7 सितंबर को इसकी कीमत 106.26 डॉलर प्रति बैरल रही। रेटिंग एजेंसी इक्रा लिमिटेड के वरिष्ठ उपाध्यक्ष प्रशांत वशिष्ट ने बताया कि ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव के कारण होर्मुज जलडमरूमध्य के माध्यम से कच्चे तेल की आपूर्ति में बाधा आ सकती है।
पेट्रोलियम कंपनियों पर दबाव
कच्चे तेल की कीमतों में हालिया वृद्धि से वाहन ईंधन बेचने वाली कंपनियों के मार्जिन पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। इसके अलावा, घरेलू एलपीजी की बिक्री पर भी लागत से कम कीमत पर बिक्री का बोझ बढ़ सकता है। वर्तमान में, पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतें तीन महीने से अधिक समय से स्थिर हैं, और इनकी कीमतों में आखिरी बार 25 मई को वृद्धि हुई थी।
वैश्विक आपूर्ति में कमी
कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों से सार्वजनिक क्षेत्र की पेट्रोलियम कंपनियों के मार्जिन पर भी दबाव बढ़ सकता है। ये कंपनियां अंतरराष्ट्रीय कीमतों में पिछली बढ़ोतरी का पूरा बोझ ग्राहकों पर नहीं डाल पाने के कारण पहले से ही नुकसान का सामना कर रही हैं। पश्चिम एशिया में संघर्ष के कारण होर्मुज जलडमरूमध्य से तेल की वैश्विक आपूर्ति में कमी आई है। इस मार्ग से आमतौर पर वैश्विक तेल और तरलीकृत प्राकृतिक गैस (LNG) की आपूर्ति का लगभग 20% गुजरता है।
भविष्य की संभावनाएं
संघर्ष के कारण पश्चिम एशिया से तेल की आपूर्ति घटकर लगभग 1.1 करोड़ बैरल प्रतिदिन रह गई है, जो पहले लगभग 1.8 करोड़ बैरल प्रतिदिन थी। ऊर्जा शोध एवं परामर्श कंपनी वुड मैकेंजी के अनुसार, यदि पश्चिम एशिया में संघर्ष साल के अंत तक जारी रहता है, तो अक्टूबर-दिसंबर तिमाही में वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल का प्रसंस्करण लगभग 14 लाख बैरल प्रतिदिन घट सकता है, जिसमें सबसे अधिक कमी एशिया में देखने को मिलेगी।
