भारत में चीनी की बढ़ती कीमतें: सरकार के लिए नई चुनौतियाँ
चीनी की कीमतों में वृद्धि का कारण
इस समय, चीनी की कीमतों में वृद्धि ने सरकार और आम जनता दोनों के लिए चिंता का विषय बना दिया है। देश में गन्ने की खेती का क्षेत्रफल बढ़ा है और चीनी मिलों के पास उत्पादन की क्षमता भी है, फिर भी बाजार में चीनी की कमी हो रही है। इस स्थिति के चलते कीमतें तेजी से बढ़ रही हैं, और अब केंद्र सरकार आयात शुल्क को हटाकर विदेशी चीनी मंगाने पर विचार कर रही है।
सरकार का आयात शुल्क हटाने का विचार
वर्तमान में, भारत में चीनी के आयात पर 100 प्रतिशत शुल्क लागू है। सरकार इसे हटाने पर विचार कर रही है ताकि घरेलू बाजार में चीनी की आपूर्ति बढ़ सके। यह निर्णय ऐसे समय में लिया जा रहा है जब गणेश चतुर्थी, दशहरा और दीपावली जैसे त्योहार नजदीक हैं, जिससे मिठाइयों और अन्य खाद्य उत्पादों में चीनी की मांग बढ़ने की संभावना है।
चीनी की थोक कीमतों में वृद्धि
महाराष्ट्र के कोल्हापुर में अगस्त की शुरुआत से चीनी की थोक कीमत लगभग 20 प्रतिशत बढ़कर 5,350 रुपये प्रति 100 किलोग्राम हो गई है। उपभोक्ता मामलों के विभाग के आंकड़ों के अनुसार, 18 अगस्त को देश में चीनी की औसत खुदरा कीमत लगभग 52.30 रुपये प्रति किलोग्राम थी। पंजाब में कुछ स्थानों पर यह कीमत 65 रुपये तक पहुंच गई है, जबकि मुंबई और भोपाल जैसे शहरों में कीमतें 58 से 63 रुपये प्रति किलोग्राम के बीच हैं।
एथनॉल उत्पादन का प्रभाव
विशेषज्ञों का मानना है कि इस स्थिति का मुख्य कारण गन्ने का एक हिस्सा चीनी के बजाय एथनॉल उत्पादन में उपयोग होना है। भारत पेट्रोल में 20 प्रतिशत एथनॉल मिलाने के लक्ष्य की ओर बढ़ रहा है, जिसके लिए पिछले कुछ वर्षों में एथनॉल उत्पादन की क्षमता में तेजी से वृद्धि हुई है। अखिल भारतीय आसवनी संघ के अनुसार, 2025 तक देश में एथनॉल उत्पादन की कुल क्षमता लगभग 1,822 करोड़ लीटर सालाना हो जाएगी।
कृषि विशेषज्ञों की राय
कृषि विशेषज्ञ और लखनऊ विश्वविद्यालय के प्रोफेसर सुधीर पंवार का कहना है कि एथनॉल के लिए गन्ने का उपयोग बढ़ने से चीनी की उपलब्धता पर असर पड़ा है। उन्होंने यह भी बताया कि उत्तर प्रदेश में 2025-26 के दौरान फसल में बीमारियों के कारण गन्ने की उत्पादकता और चीनी की रिकवरी में कमी आई है। उनके अनुसार, बाजार में जमाखोरी और गलत अनुमान भी कीमतों में वृद्धि का कारण हो सकते हैं।
भारत का चीनी निर्यात
भारत कभी दुनिया के प्रमुख चीनी निर्यातकों में से एक था। 2021-22 में, देश ने 1.2 करोड़ टन से अधिक चीनी का निर्यात किया था। लेकिन घरेलू आपूर्ति को बनाए रखने के लिए सरकार ने धीरे-धीरे निर्यात पर पाबंदियाँ बढ़ा दीं। 2025-26 के लिए लगभग 20 लाख टन निर्यात की अनुमति दी गई और मई 2026 में चीनी निर्यात पर रोक लगा दी गई।
सरकार के नए कदम
इसके बावजूद, घरेलू कीमतों में कमी नहीं आई है। अब सरकार आयात शुल्क हटाने के साथ-साथ थोक कारोबारियों के लिए चीनी के भंडारण की सीमा तय करने और एथनॉल के लिए गन्ने के उपयोग को सीमित करने जैसे विकल्पों पर भी विचार कर रही है।
आर्थिक सलाहकार की सलाह
मुख्य आर्थिक सलाहकार वी. अनंत नागेश्वरन ने खाद्य आवश्यकताओं और ईंधन नीति के बीच संतुलन की आवश्यकता पर जोर दिया है। उन्होंने सुझाव दिया है कि भारत को 20 प्रतिशत एथनॉल मिश्रण के स्तर पर रुककर खाद्य और ईंधन के बीच प्रभाव का पूरी तरह से आकलन करना चाहिए।
राजनीतिक मुद्दा बनती चीनी की कीमतें
चीनी की बढ़ती कीमतें अब राजनीतिक मुद्दा भी बन गई हैं। टीम भारत के संस्थापक तहसीन पूनावाला ने एथनॉल नीति को कीमतों में वृद्धि से जोड़ते हुए 22 और 23 अगस्त को दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन और भूख हड़ताल का ऐलान किया है। सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती त्योहारों के दौरान चीनी की पर्याप्त आपूर्ति और कीमतों को नियंत्रित करना है। इसके साथ ही, उसे यह भी सुनिश्चित करना होगा कि ऊर्जा सुरक्षा और घरेलू खाद्य कीमतों के बीच सही संतुलन कैसे बनाया जाए।
