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भारत में डेटा सेंटर उद्योग का तेजी से बढ़ता भविष्य

भारत में डेटा सेंटर उद्योग तेजी से विकसित हो रहा है, जिसमें डिजिटल सेवाओं की बढ़ती मांग और निवेश की संभावनाएँ शामिल हैं। क्रिसिल की रिपोर्ट के अनुसार, 2030 तक डेटा सेंटर की क्षमता 7.5 गीगावाट तक पहुंच सकती है। हालांकि, बिजली की उपलब्धता और बड़ी तकनीकी कंपनियों पर निर्भरता जैसे मुद्दे भी सामने आ रहे हैं। जानें इस क्षेत्र के विकास के पीछे के कारण और भविष्य की चुनौतियाँ।
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डिजिटल सेवाओं की बढ़ती मांग

भारत में डिजिटल सेवाओं का उपयोग तेजी से बढ़ रहा है, जिसका प्रभाव डेटा सेंटर उद्योग पर भी स्पष्ट रूप से देखा जा रहा है। इंटरनेट, ऑनलाइन भुगतान, वीडियो स्ट्रीमिंग और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसी सेवाओं की बढ़ती मांग के चलते देश में डेटा सेंटर स्थापित करने के लिए भारी निवेश की आवश्यकता होगी। क्रिसिल रेटिंग्स की एक रिपोर्ट के अनुसार, मार्च 2030 तक भारत में डेटा सेंटर की कुल क्षमता मौजूदा स्तर से लगभग 5 गुना बढ़कर 7.5 गीगावाट तक पहुंच सकती है। इस विस्तार के लिए अगले चार वित्तीय वर्षों में 3 लाख करोड़ रुपये से अधिक का निवेश होने की संभावना है.


विकास के प्रमुख कारण

रिपोर्ट में बताया गया है कि इस वृद्धि के पीछे मुख्य कारण जनरेटिव आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, कंपनियों का तेजी से डिजिटल रूपांतरण और इंटरनेट पर डेटा का बढ़ता उपयोग है। बड़ी तकनीकी कंपनियों को अपने ऑनलाइन संचालन, क्लाउड सेवाओं और एआई से संबंधित कार्यों के लिए उच्च क्षमता वाले डेटा सेंटर की आवश्यकता महसूस हो रही है। इस कारण भारत में इस क्षेत्र में निवेशकों और वैश्विक कंपनियों की रुचि बढ़ी है.


बिजली कनेक्शन और सरकारी मंजूरी की आवश्यकता

क्रिसिल का कहना है कि इस विस्तार का लाभ तभी उठाया जा सकेगा जब कंपनियों को समय पर बिजली कनेक्शन, आवश्यक सरकारी मंजूरी और निर्माण से संबंधित सुविधाएं उपलब्ध होंगी। रिपोर्ट के अनुसार, आने वाली कुल क्षमता का लगभग आधा हिस्सा पहले ही दीर्घकालिक समझौतों के तहत तय किया जा चुका है। इसके अलावा, निर्माणाधीन क्षमता में से 95 प्रतिशत से अधिक के लिए ग्राहक पहले से ही मिल चुके हैं, जिससे परियोजनाओं के पूरा होने के बाद खाली रहने का खतरा कम होता है.


कम लागत का लाभ

भारत में डेटा सेंटर स्थापित करने की लागत अन्य एशियाई बाजारों की तुलना में कम है। क्रिसिल रेटिंग्स के निदेशक आनंद कुलकर्णी के अनुसार, भूमि, निर्माण और श्रम की अपेक्षाकृत कम लागत के कारण भारत में डेटा सेंटर विकसित करना कई प्रतिस्पर्धी देशों की तुलना में लगभग 20 प्रतिशत सस्ता है। इसके अलावा, बिजली की कम दरों के कारण यहां किराया भी अन्य बाजारों की तुलना में 30 से 35 प्रतिशत तक कम है. नवीकरणीय ऊर्जा से संचालित बड़े परिसर भारत को वैश्विक कंपनियों के लिए और अधिक आकर्षक बनाते हैं.


बिजली की उपलब्धता की चुनौती

हालांकि, इस तेजी से बढ़ते उद्योग के सामने बिजली की उपलब्धता एक बड़ी चुनौती बन सकती है। क्रिसिल के अनुसार, आने वाली लगभग 6 गीगावाट क्षमता का लगभग तीन-चौथाई हिस्सा विशाखापत्तनम, मुंबई और हैदराबाद में विकसित होने की उम्मीद है। 2030 तक इन शहरों में डेटा सेंटर की बिजली की आवश्यकता उनकी मौजूदा अधिकतम मांग के मुकाबले क्रमशः लगभग 80 प्रतिशत, 60 प्रतिशत और 20 प्रतिशत तक पहुंच सकती है। इसलिए, बिजली ग्रिड और ट्रांसमिशन प्रणाली को समय पर मजबूत करना आवश्यक होगा.


ग्राहकों के साथ दीर्घकालिक समझौते

रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया है कि भारत में मौजूदा डेटा सेंटर लगभग 90 प्रतिशत क्षमता के साथ कार्यरत हैं। क्रिसिल के एसोसिएट निदेशक नितिन बंसल के अनुसार, ग्राहकों के साथ होने वाले समझौतों की अवधि बढ़कर 15 से 20 वर्ष हो गई है, जबकि पहले यह 10 से 12 वर्ष होती थी। इससे कंपनियों को लंबे समय तक आय का भरोसा मिलता है. हालांकि, नए एआई कार्यों के लिए बेहतर शीतलन प्रणाली और अधिक बिजली क्षमता वाले उपकरणों में निरंतर निवेश की आवश्यकता होगी.


बड़ी तकनीकी कंपनियों पर निर्भरता

दूसरी ओर, बड़ी वैश्विक तकनीकी कंपनियों पर बढ़ती निर्भरता भी जोखिम पैदा कर सकती है। 2030 तक कुल किराए पर दी गई क्षमता में इन कंपनियों की हिस्सेदारी 75 से 80 प्रतिशत तक पहुंचने का अनुमान है, जो 2026 में 60 से 65 प्रतिशत थी। इससे कीमतों के निर्धारण में ग्राहकों का दबदबा बढ़ सकता है। डेटा सेंटर बनाने में आय शुरू होने से पहले 24 से 36 महीने तक निवेश करना पड़ता है, जिससे कर्ज का बोझ भी बढ़ता है. इस क्षेत्र की सफलता के लिए समय पर परियोजनाओं का पूरा होना, लागत का प्रबंधन और बदलती तकनीक के अनुसार सुविधाओं का विकास आवश्यक होगा.