भारत में पीतल के दामों में अभूतपूर्व वृद्धि: जानें कारण और प्रभाव
पीतल के दामों में उछाल
यदि आपने हाल के वर्षों में पीतल के बर्तन या कच्चा माल खरीदने के लिए बाजार का दौरा किया है, तो आप निश्चित रूप से कीमतों में आई भारी वृद्धि को महसूस कर चुके होंगे। आंकड़ों के अनुसार, 2021 से 2026 के बीच भारत में पीतल की कीमतों में लगभग 98.8% की वृद्धि हुई है, जो लगभग दोगुनी हो गई है। इस वृद्धि का मुख्य कारण अंतरराष्ट्रीय और घरेलू बाजारों में तांबे और जस्ते की कीमतों में उछाल है। चूंकि पीतल तांबे और जस्ते के मिश्रण से बनता है, इसलिए इन धातुओं की बढ़ती कीमतों ने पीतल के बर्तनों की कीमतों को भी बढ़ा दिया है.
जामनगर: पीतल का प्रमुख केंद्र
गुजरात का जामनगर भारत में पीतल का सबसे बड़ा निर्माण केंद्र है, जहां देश की लगभग 90% पीतल की मांग पूरी होती है। यहां की लगभग 6,000 से 7,000 छोटी औद्योगिक इकाइयां रोजाना 600 से 700 टन मेटल स्क्रैप का उपयोग करती हैं। हालांकि, इस उद्योग की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि इसे चलाने के लिए लगभग 70% कच्चा माल विदेशों से आयात करना पड़ता है.
दामों में वृद्धि का विश्लेषण
नए तांबे और जस्ते से पीतल का निर्माण महंगा हो गया है, इसलिए भारतीय निर्माता पुराने पीतल और कबाड़ का उपयोग कर रहे हैं। लेकिन विदेशों में स्क्रैप की बढ़ती कीमतें और अशुद्धियों के कारण होने वाले नुकसान ने इस क्षेत्र के लिए चुनौतियां बढ़ा दी हैं। 2021 की शुरुआत में पीतल की कीमत 420 रुपये प्रति किलो थी, जो 2026 में बढ़कर 835 रुपये प्रति किलो हो गई है, जिससे कुल वृद्धि 98.81% हो गई है.
भारत में स्क्रैप का उपयोग
खान मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2023-24 में भारत ने लगभग 3.10 लाख टन कॉपर स्क्रैप का आयात किया, जिसमें हर साल 10% की वृद्धि हो रही है। वित्त वर्ष 2024-25 में, देश में 5.34 लाख टन कॉपर स्क्रैप और 2.52 लाख टन पीतल स्क्रैप की सप्लाई हुई। इनमें से 3.69 लाख टन पीतल स्क्रैप को स्थानीय भट्टियों में पिघलाकर नए उत्पादों में बदला गया.
पीतल के बर्तनों की महंगाई के कारण
पीतल एक मिश्र धातु है, जिसमें 60 से 70 प्रतिशत तांबा और 30 से 40 प्रतिशत जस्ता होता है। वैश्विक बाजार में तांबे की कीमतें उच्चतम स्तर पर हैं, जिससे पीतल के निर्माण की लागत बढ़ गई है। इसके अलावा, आयातित स्क्रैप में अशुद्धियों के कारण छोटे निर्माताओं को अतिरिक्त लागत का सामना करना पड़ता है.
भविष्य की चुनौतियाँ
यूरोपीय संघ द्वारा 2027 से गैर-OECD देशों को कबाड़ के निर्यात पर प्रतिबंध लगाने की योजना से जामनगर के पीतल उद्योग को कच्चे माल की गंभीर कमी का सामना करना पड़ सकता है। भारत को विदेशी स्क्रैप पर निर्भरता कम करने के लिए घरेलू स्तर पर कबाड़ इकट्ठा करने, आधुनिक रीसाइक्लिंग केंद्र स्थापित करने और रीफाइनिंग क्षमताओं को बढ़ाने की आवश्यकता है.
