भारतीय स्मार्टफोन बाजार में बदलाव: ओप्पो और शाओमी की चुनौती, लावा और Ai+ का उभार
स्मार्टफोन बाजार में नया मोड़
भारत के स्मार्टफोन क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन देखने को मिल रहा है। पहले कम कीमत और शानदार फीचर्स के कारण ग्राहकों के बीच लोकप्रिय रहने वाली चीनी कंपनियां जैसे ओप्पो, वीवो और शाओमी अब बढ़ती लागत और घटती मांग से जूझ रही हैं। इसके विपरीत, भारतीय ब्रांड जैसे लावा और Ai+ इस स्थिति का लाभ उठाकर अपनी बाजार हिस्सेदारी में वृद्धि कर रहे हैं। जुलाई से सितंबर 2026 की तिमाही में, घरेलू स्मार्टफोन कंपनियों की संयुक्त हिस्सेदारी 7 प्रतिशत तक पहुंच गई, जो पिछले वर्ष केवल 2 प्रतिशत थी। यह आंकड़ा दिसंबर 2018 के बाद का सबसे ऊंचा स्तर है। हालांकि, इस दौरान स्मार्टफोन की कुल बिक्री और शिपमेंट में कमी भी आई है।
चीनी कंपनियों की हिस्सेदारी में कमी
ओम्डिया द्वारा किए गए एक अध्ययन के अनुसार, सितंबर तिमाही में भारतीय स्मार्टफोन शिपमेंट में चीनी ब्रांडों की हिस्सेदारी घटकर लगभग 68 प्रतिशत रह गई, जो पिछले वर्ष 75 प्रतिशत थी। काउंटरपॉइंट रिसर्च ने इसे 67 प्रतिशत बताया है। मेमोरी चिप्स और अन्य घटकों की बढ़ती कीमतों ने सस्ते स्मार्टफोन निर्माताओं पर दबाव डाला है।
बजट फोन की निर्माण लागत में मेमोरी घटकों की हिस्सेदारी लगभग 40 प्रतिशत तक हो सकती है, जिससे कंपनियों के लिए कीमतें कम रखना चुनौतीपूर्ण हो गया है। ओप्पो, वीवो और शाओमी ने एंट्री-लेवल फोन के विकल्पों को कम किया है और अब मिड-रेंज और प्रीमियम स्मार्टफोन पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं, जिसका लाभ भारतीय कंपनियों को मिल सकता है।
Ai+ और लावा की बिक्री में वृद्धि
भारतीय कंपनियों में Ai+ एक तेजी से उभरता हुआ नाम है। जुलाई 2025 में बाजार में आने वाली इस कंपनी के फोन की कीमत लगभग 10,000 से 25,000 रुपये के बीच है। कंपनी के संस्थापक माधव सेठ के अनुसार, इस तिमाही में उन्होंने उतने हैंडसेट बेचे हैं, जितने पिछले पूरे वर्ष में बिके थे। ओम्डिया के आंकड़ों के अनुसार, सितंबर तिमाही में कंपनी के शिपमेंट में सालाना आधार पर चार गुना वृद्धि हुई है।
लावा भी लागत के दबाव के बावजूद अपने बाजार में स्थान मजबूत करने की कोशिश कर रही है। कंपनी के एंट्री-लेवल 5G स्मार्टफोन की शुरुआती कीमत पहले 7,999 रुपये थी, जो अब बढ़कर 14,499 रुपये हो गई है। कंपनी का कहना है कि वह बेहतर घटक चयन, सॉफ्टवेयर सुधार और रणनीतिक खरीद के माध्यम से लागत को नियंत्रित करने का प्रयास कर रही है।
सरकारी समर्थन से भारतीय मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा
भारत में मोबाइल फोन निर्माण का विस्तार घरेलू ब्रांडों के लिए एक मजबूत आधार तैयार कर रहा है। वर्ष 2014-15 में मोबाइल फोन का उत्पादन लगभग 18,000 करोड़ रुपये था, जो 2025-26 में बढ़कर 6.27 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचने की उम्मीद है। इसी अवधि में मोबाइल फोन का निर्यात भी 1,500 करोड़ रुपये से बढ़कर 2.59 लाख करोड़ रुपये हो गया है।
सरकार की प्रोडक्शन-लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) योजनाओं और स्थानीय निर्माण को बढ़ावा देने वाली नीतियों ने इस क्षेत्र में कारखानों, सप्लायरों और तकनीकी विशेषज्ञता का विस्तार किया है। प्रस्तावित मोबाइल फोन मैन्युफैक्चरिंग योजना के तहत भारतीय स्वामित्व वाले ब्रांडों को डिजाइन, अनुसंधान और विकास तथा घरेलू घटक सोर्सिंग में प्रोत्साहन देने का प्रयास किया जा रहा है।
ग्राहकों का विश्वास जीतना है असली चुनौती
भारतीय कंपनियों के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल कम कीमत पर फोन बेचना नहीं है, बल्कि बेहतर कैमरा, सॉफ्टवेयर अपडेट, टिकाऊपन और बिक्री के बाद भरोसेमंद सेवा प्रदान करना भी है। माइक्रोमैक्स, कार्बन और अन्य कंपनियों की संभावित वापसी से प्रतिस्पर्धा और बढ़ सकती है।
यदि मेमोरी चिप की कीमतों में कमी आती है, तो चीनी कंपनियां फिर से अपनी पकड़ मजबूत कर सकती हैं। इसलिए लावा और Ai+ को मौजूदा अवसर का स्थायी लाभ उठाने के लिए तकनीक, उत्पाद गुणवत्ता, वितरण नेटवर्क और ग्राहक सेवा में निरंतर निवेश करना होगा।
