सकल घरेलू उत्पाद के आंकड़ों पर सुभाष चंद्र गर्ग और गौरव वल्लभ के बीच बहस
हाल ही में, पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग और प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्य गौरव वल्लभ के बीच GDP आंकड़ों में संशोधन को लेकर तीखी बहस हुई। गर्ग ने आंकड़ों में हुई बड़ी गिरावट पर सवाल उठाया, जबकि वल्लभ ने नई गणना पद्धति और आर्थिक गतिविधियों के दायरे में बदलाव का हवाला दिया। दोनों पक्षों ने रोजगार के मुद्दे पर भी चर्चा की। क्या यह संशोधन बेहतर आंकड़ों का परिणाम है या सरकार को और स्पष्टीकरण की आवश्यकता है? जानें इस बहस के सभी पहलुओं के बारे में।
| Sep 3, 2026, 22:06 IST
सकल घरेलू उत्पाद के आंकड़ों पर विवाद
हाल ही में देश की अर्थव्यवस्था के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के आंकड़ों को लेकर पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग और प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्य गौरव वल्लभ के बीच तीखी बहस हुई। एक समाचार चैनल पर चर्चा के दौरान, दोनों ने पुराने और संशोधित GDP आंकड़ों के बारे में भिन्न दृष्टिकोण प्रस्तुत किए। बहस का मुख्य बिंदु यह था कि आंकड़ों में इतनी बड़ी गिरावट का कारण क्या है, और क्या यह केवल गणना की विधि में बदलाव का परिणाम है।
सुभाष चंद्र गर्ग ने मौजूदा कीमतों पर GDP के आंकड़ों में हुए बड़े संशोधन पर सवाल उठाते हुए कहा कि पिछले वित्त वर्ष की पहली तिमाही का आंकड़ा पहले लगभग 86 लाख करोड़ रुपये था, लेकिन संशोधन के बाद यह घटकर लगभग 80 लाख करोड़ रुपये रह गया है। उनके अनुसार, यह लगभग छह लाख करोड़ रुपये का अंतर मामूली नहीं है और सरकार को इसके पीछे की पूरी वजह स्पष्ट करनी चाहिए।
गर्ग ने यह भी कहा कि उनकी चिंता केवल आधार वर्ष या कीमतों में बदलाव से नहीं है, बल्कि मौजूदा कीमतों पर GDP के आंकड़ों में इतनी बड़ी कटौती से है। उन्होंने यह दावा किया कि 2023-24 के मौजूदा कीमतों वाले GDP में हाल के संशोधन के दौरान लगभग छह से साढ़े छह लाख करोड़ रुपये की वृद्धि की गई थी। उनका कहना था कि इस तरह के बड़े बदलाव सामान्य संशोधन से कहीं अधिक गंभीर सवाल उठाते हैं।
गर्ग ने पहले भी पुराने आंकड़ों के आधार पर अर्थव्यवस्था की वास्तविक वृद्धि को लेकर अपनी गणना प्रस्तुत की है। उनका कहना था कि पहले जारी मौजूदा कीमतों के आंकड़ों के अनुसार वृद्धि दर लगभग 2.6 प्रतिशत थी। उन्होंने स्पष्ट किया कि उनकी गणना में कीमतों को समायोजित करने वाले सूचकांक को बदलने की बात नहीं थी।
वहीं, गौरव वल्लभ ने गर्ग की आपत्ति को आंकड़ों की तुलना के तरीके से जोड़ते हुए कहा कि आधार वर्ष में बदलाव का मतलब केवल कीमतों में बदलाव नहीं है। नई गणना में आर्थिक गतिविधियों का दायरा भी बदला गया है। उन्होंने बताया कि नए सर्वेक्षण, वस्तु एवं सेवा कर के रिकॉर्ड, कंपनियों से प्राप्त बेहतर आंकड़े और सरकारी अभिलेखों को भी गणना में शामिल किया गया है।
वल्लभ के अनुसार, यदि आर्थिक गतिविधियों के दायरे में बदलाव हुआ है, तो पुराने और नए आंकड़ों की सीधी तुलना करना उचित नहीं होगा। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि नई जानकारी मिलने पर किसी कारखाने को गणना में शामिल किया जा सकता है या बाहर किया जा सकता है। इसलिए 86 लाख करोड़ और 80 लाख करोड़ रुपये के आंकड़ों को एक ही गणना पद्धति के आधार पर मानना सही नहीं है।
उन्होंने यह भी कहा कि GDP के आंकड़ों में कई चरणों में संशोधन होता है और पहली बार जारी आंकड़ों को अंतिम नहीं माना जाना चाहिए। हालांकि, गर्ग ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया और कहा कि मौजूदा कीमतों के आंकड़ों में इतनी बड़ी कमी को केवल गणना पद्धति में बदलाव बताकर सवाल खत्म नहीं किया जा सकता।
यह बहस रोजगार के मुद्दे तक भी पहुंची। वल्लभ ने अर्थव्यवस्था में मजबूती के संकेत देते हुए निजी उपभोग में 7.1 प्रतिशत, स्थिर पूंजी निर्माण में 11.9 प्रतिशत और वास्तविक निर्यात में 12 प्रतिशत वृद्धि का उल्लेख किया। उन्होंने बेरोजगारी दर में कमी का भी दावा किया।
दूसरी ओर, गर्ग ने रोजगार के आंकड़ों की गुणवत्ता पर सवाल उठाया। उनका कहना था कि रोजगार में बढ़ोतरी का बड़ा हिस्सा पारिवारिक कारोबार में बिना वेतन काम करने और कृषि क्षेत्र से जुड़ा है। उनके अनुसार, केवल रोजगार की संख्या बढ़ना पर्याप्त नहीं है, बल्कि यह देखना जरूरी है कि लोगों को स्थायी और बेहतर आय वाला काम मिल रहा है या नहीं। उन्होंने शिक्षित युवाओं और श्रम बाजार से बाहर रहने वाले लोगों की स्थिति पर भी चिंता जताई।
हालांकि दोनों पक्षों के तर्कों के बावजूद, बहस का मूल सवाल यह है कि GDP के आंकड़ों में हुआ बड़ा संशोधन बेहतर आंकड़ों और नई गणना पद्धति का स्वाभाविक परिणाम है या इसके पैमाने को देखते हुए सरकार से और विस्तृत स्पष्टीकरण की आवश्यकता है। आने वाले संशोधनों और विस्तृत आंकड़ों से इस बहस को और स्पष्ट दिशा मिलने की उम्मीद है।
