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सेमीकॉन 2.0 योजना के तहत चिप विनिर्माण संयंत्रों के लिए नई शर्तें

भारत सरकार ने सेमीकॉन 2.0 योजना के तहत चिप विनिर्माण संयंत्रों के लिए नई दिशा-निर्देश जारी किए हैं। इन दिशा-निर्देशों में परियोजना की संपत्तियों को बेचने या हस्तांतरित करने पर रोक लगाई गई है। योजना के तहत 1.27 लाख करोड़ रुपये का प्रोत्साहन निर्धारित किया गया है। जानें इस योजना के प्रमुख स्तंभ और शर्तें क्या हैं।
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सेमीकॉन 2.0 योजना की नई दिशा-निर्देश

सेमीकॉन 2.0 योजना के अंतर्गत स्वीकृत चिप निर्माण संयंत्रों को तब तक अपनी परियोजना या किसी भी संपत्ति को बेचने, हस्तांतरित करने या गिरवी रखने की अनुमति नहीं होगी जब तक कि पूरी परियोजना का वाणिज्यिक उत्पादन शुरू नहीं हो जाता। सरकार ने इस योजना के दिशा-निर्देशों को जारी करते हुए यह शर्त रखी है। इस योजना के तहत 1.27 लाख करोड़ रुपये का प्रोत्साहन निर्धारित किया गया है।


दिशा-निर्देशों के अनुसार, जब तक कंपनी को नोडल एजेंसी से पूर्व अनुमति नहीं मिलती, तब तक वह परियोजना की संपत्तियों या उनके किसी हिस्से को बेच या हस्तांतरित नहीं कर सकती। इसके अलावा, उन पर बंधक या किसी अन्य प्रकार का भार भी नहीं डाला जा सकता है। हालांकि, सामान्य व्यापारिक गतिविधियों के तहत ऐसा किया जा सकता है। इस योजना के छह स्तंभों में चिप डिजाइन, मशीन एवं सामग्री, फैब्रिकेशन संयंत्रों की स्थापना, एटीएमपी एवं ओएसएटी उद्योग को सशक्त करना, शोध एवं विकास और प्रतिभा विकास शामिल हैं।


इनमें से मशीन एवं सामग्री, फैब्रिकेशन संयंत्रों की स्थापना और एटीएमपी (असेंबली, परीक्षण, मार्किंग और पैकेजिंग) एवं ओएसएटी (बाहरी एजेंसी के माध्यम से सेमीकंडक्टर की असेंबली और परीक्षण) उद्योग को मजबूत करने वाले तीन स्तंभों के दिशा-निर्देश जारी किए गए हैं। मशीन और सामग्री क्षेत्र में आवेदन करने वाली कंपनियां भारत में निर्मित कलपुर्जों और उप-इकाइयों की घरेलू खरीद पर उत्पादन से जुड़े प्रोत्साहन (पीएलआई) का लाभ उठा सकती हैं। योजना के तहत वित्तीय सहायता प्राप्त करने वाली कंपनियों को वाणिज्यिक उत्पादन शुरू होने की तारीख से कम से कम तीन वर्षों तक उत्पादन जारी रखना होगा।


दिशा-निर्देशों के अनुसार, भूमि और उसके विकास, अस्थायी ढांचे, साइट कार्यालय और अन्य अस्थायी सुविधाओं पर होने वाला खर्च पात्र पूंजीगत व्यय या निवेश में शामिल नहीं किया जाएगा। प्रौद्योगिकी हस्तांतरण, निर्माण अवधि के ब्याज और अनुसंधान एवं विकास पर होने वाला खर्च भी इसमें शामिल नहीं होगा। योजना के तहत आवेदन करने वाली कंपनी और उसके प्रवर्तक या समूह के पास वित्तीय सहायता समझौते (एफएसए) की अवधि के दौरान परियोजना कंपनी की कुल इक्विटी शेयर पूंजी का कम से कम 51 प्रतिशत हिस्सा और उसके अनुरूप मतदान अधिकार होना आवश्यक है।


यह शर्त वाणिज्यिक उत्पादन शुरू होने के बाद तीन साल की संचालन अवधि के दौरान भी लागू रहेगी। नियंत्रण रखने वाली इकाई की पहचान आवेदन के समय ही करनी होगी और उसकी निरंतरता वित्तीय सहायता जारी रखने की शर्त होगी। इस अवधि में हिस्सेदारी में किसी भी बदलाव की जानकारी नोडल एजेंसी को देनी होगी।