शिक्षा प्रणाली की विफलता: एक गंभीर चिंतन
शिक्षा की थाली: भरी हुई लेकिन खाली
एक बच्चा एक थाली के सामने बैठा है, जिसमें ज्ञान का पूरा इतिहास एक साथ परोसा गया है, और कहा गया है—“लो, खाओ।” लेकिन जब ध्यान से देखें, तो वह थाली पूरी तरह से खाली है। जब बारह साल बाद एक बच्चा बाहर निकलता है और एक साधारण पैराग्राफ़ पढ़ने में असमर्थ होता है, तो आप किस पर उंगली उठाएंगे? कोई एक वादा नहीं टूटा, बल्कि सभी वादे एक साथ किए गए थे और आपस में मिलकर गायब हो गए।
जब भी भारतीय व्यवस्था का कोई स्तंभ ढहता है, तो उसका धुआँ समय पर दिखाई देता है। पहले नाकामी आती है, जो वर्षों से किसी अंधेरे कोने में सुलग रही होती है—जैसे परीक्षा बोर्ड का खामोश ढाँचा, बिकता प्रश्नपत्र, या एक रात में लागू की गई नीति, जिस पर किसी ने सलाह तक नहीं ली।
फिर लपटें उठती हैं, और उनकी रोशनी तमाशबीनों की भीड़ को आकर्षित करती है—राजधानी के चौराहों पर बिलखते छात्र, गर्मी में आँसू गैस का धुआँ, भूख हड़तालें और ऐसा विपक्ष, जो हर ज़ख्म में अपनी जीत का वोट खोजने लगता है।
अंत में, मानसून की तरह टिप्पणियों का सिलसिला शुरू होता है। लेखक, अर्थशास्त्री, नीति निर्माता और आलोचक—सभी अपनी-अपनी राय लेकर मैदान में उतर आते हैं। हर किसी के पास एक तैयार नुस्खा होता है।
एक व्यक्ति को इसमें सरकार की तानाशाही नजर आती है, जो चुनाव जीतना तो जानती है, लेकिन संस्थाएँ चलाना भूल गई है। दूसरे को लगता है कि व्यवस्था अपनी संवैधानिक जिम्मेदारियों से पीछे हट रही है—जहाँ मुफ्त शिक्षा का अधिकार बिकने वाली चीज़ बन गया है।
तीसरे व्यक्ति का कहना है कि नीति-निर्माताओं की नैतिकता खोखली है और यह सिर्फ व्यवस्था का मामला है—यानी स्कूल और बाजार के बीच का टकराव। चौथे व्यक्ति को हैरानी होती है कि जो देश मशीनों के युग में बच्चों को पुरानी भाषाएँ रटवा रहा है, वह एक साधारण परीक्षा भी बिना चोरी के नहीं करा सकता।
पाँचवे व्यक्ति ने इस पूरी स्थिति को तीन शब्दों में समेट दिया—सांप्रदायिकीकरण, व्यापारीकरण और केंद्रीकरण—और परीक्षा एजेंसी के सफाए की मांग करने लगे। छठे व्यक्ति ने इसे दिमागों के ‘उपनिवेश-मुक्ति’ की महान क्रांति बताया और विरोध की आवाजों में कोचिंग माफिया की साजिश देखी।
हर कोई अपने-अपने ढंग से सही है। और यही असली समस्या है। पढ़ने वाला इन दलीलों को सुनता है, हर बात पर सहमत होता है, लेकिन यह नहीं समझ पाता कि कुछ क्यों नहीं बदल रहा।
इन सभी बुद्धिजीवियों की लेखनी में एक समानता है—निशाना। सभी उस चीज़ पर तीर चला रहे हैं, जो सामने है—लीक हुआ प्रश्नपत्र, ताज़ा आदेश, सड़कों पर जमा भीड़ और कटघरे में खड़ा मंत्री। सभी असर पर हमला कर रहे हैं, वजह पर नहीं।
हमारे बुद्धिजीवियों ने खुद को बीमारी के लक्षणों का सुंदर वर्णन करने वाला ऐसा बारीक औजार बना लिया है कि बयानबाज़ी ही अपने आप में एक नशा बन चुकी है। जो देश अपनी बीमारी का नाम छह अलग-अलग भाषाओं में लेना सीख जाए, उसे इलाज की कोई जल्दी नहीं रहती। यह बहस किसी सुधार की तरफ नहीं ले जाती; यह असल में उस सुधार की जगह लेने वाला नशा है।
धुएँ के पीछे जलती इमारत को देखने के बजाय, ज़रा उस ढाँचे को देखिए, जिसे बनाया ही जलने के लिए गया था। कुछ साल पहले मैंने भारतीय कक्षा की तुलना एक थाली से की थी। बच्चा एक ऐसी थाली के सामने बैठा है, जो बेहिसाब पकवानों से भरी पड़ी है—दर्जनों विषय, तीन-तीन भाषाएँ और ऐसा पाठ्यक्रम, मानो दस साल के बच्चे के सामने इंसानियत के पूरे ज्ञान का इतिहास एक ही बार में परोसा गया हो और कहा गया हो—“लो, खाओ।”
थाली भरी हुई है। लेकिन, ध्यान से देखें तो वह पूरी तरह खाली है। दुनिया का कोई बच्चा उस थाली से अपना पेट नहीं भर सकता। जो परोसा गया है, वह खाना नहीं—खाने का केवल भ्रम है।
मैंने अपनी किताब का नाम रखा था—द फुल प्लेट। मुझे लगा था कि मैं व्यवस्था की एक भूल का ज़िक्र कर रहा हूँ। लेकिन असल में मैं उसके एक चालाक समाधान की व्याख्या कर रहा था। थाली भूल से भारी नहीं की गई है। उसे जान-बूझकर ऐसे भरा गया है, क्योंकि जो व्यवस्था सब कुछ देने का दावा करती है, उस पर किसी एक नाकामी का आरोप नहीं लगाया जा सकता।
जब बारह साल बाद एक बच्चा बाहर निकलता है और वह एक पैराग्राफ़ पढ़ नहीं पाता या एक मामूली घटाव नहीं कर पाता, तो आप उँगली किस पर उठाएँगे? कोई एक वादा टूटा ही नहीं, सारे वादे एक साथ किए गए थे और सब एक-दूसरे में घुलकर गायब हो गए।
यह फैलाव कोई उदारता नहीं है। यह तो जिम्मेदारी को इतने छोटे-छोटे टुकड़ों में बाँट देना है कि नाकामी का कोई एक सुराग ही न मिले। जिसकी नाप-जोख न हो सके, उस पर अदालत कैसे चले? भरी हुई थाली दरअसल ऐसा बही-खाता है, जिसे इतना उलझा दिया गया है कि कोई उसका ऑडिट ही न कर सके।
यह किसी अफ़सर की नालायकी नहीं है। यह तो इस मशीन का असली डिज़ाइन है, जो ठीक वैसा ही काम कर रहा है, जैसा उसे करने के लिए बनाया गया था। और यही बात सबसे ज्यादा डरावनी है। क्योंकि नालायकी सुधारी जा सकती है, पर अपने मकसद में सफल मशीन को उसकी फितरत से बाज़ नहीं लाया जा सकता।
ज़रा गौर से देखिए कि यह मशीन कर क्या रही है? इसने पढ़ाई की कसौटी को पूरी तरह ‘परीक्षा की कसौटी’ से बदल दिया है। ये दोनों बातें कभी एक नहीं थीं, और अब इनके बीच इतनी दूरी आ चुकी है कि एक पूरी समानांतर अर्थव्यवस्था उसी खाली जगह में फल-फूल रही है, जहाँ ‘पास होने’ और ‘जानने’ का सौदा होता है।
परीक्षा ही अब अकेला दरवाज़ा बन चुकी है। और क्योंकि वही अकेला दरवाज़ा है, इसलिए समाज की हर ताकत उसी पर टूट पड़ती है—लीक होते प्रश्नपत्र, मुन्ना भाइयों के गिरोह, कोचिंग की दुकानें और खरीदे गए नतीजे। जो विश्लेषक लीक होते प्रश्नपत्रों पर माथा पीटते हैं, वे पाइप के दबाव को पाइप की खराबी समझ बैठते हैं। वह दबाव इसलिए है क्योंकि व्यवस्था ने पूरे देश की उम्मीदों का सारा बोझ एक ही वाल्व पर लाद दिया है। वह वाल्व इसलिए नहीं फटता कि कुछ गड़बड़ हो गई है; वह इसलिए फटता है क्योंकि जब एक पूरी सभ्यता का बोझ एक ही जगह पड़ेगा, तो फटना ही उसका एकमात्र काम रह जाएगा।
मैंने बाद में लिखा था कि कोई भी व्यवस्था सिर्फ़ पढ़ाती नहीं, बल्कि खुद भी सीखती है। जो व्यवस्था सीख नहीं सकती, वह ठहरती नहीं—वह सड़ने लगती है। कोई तीसरा रास्ता नहीं है।
सीखने वाली व्यवस्था वह होती है, जिसके संस्थान अपनी नाकामियों से सीखते हैं; जहाँ किनारे पर हुई गड़बड़ी केंद्र तक पहुँचती है और केंद्र को खुद में बदलाव करने पर मजबूर करती है। लेकिन हमारे पास जो है, वह है—‘अदाकारी करने वाली व्यवस्था’ (परफ़ॉर्मिंग स्टेट)।
अदाकारी करने वाली व्यवस्था नाकामी से सीखती नहीं, उसका नाटक रचती है। प्रश्नपत्र लीक होता है। बच्चे इकट्ठा होते हैं। तंत्र चौंककर जागता है। पर ज़रा ध्यान से देखिए कि जागता क्या है—पाइप को ठीक करने की नीयत नहीं, बल्कि पाइप के दिखाई देने का प्रबंध!
समितियों का ऐलान होता है। मंत्रियों को बचाया या बलि का बकरा बनाया जाता है। एजेंसियों के नाम बदलकर उन्हें नया अवतार दे दिया जाता है। बुनियादी ढाँचा वहीं का वहीं रहता है। अखबारों में लेख छपते हैं। जनता का गुस्सा ठंडा पड़ता है। और मशीन फिर से अपने पुराने ढर्रे पर चलने लगती है।
कुछ भी नहीं सीखा गया, क्योंकि सीखना कभी इस मशीन का काम था ही नहीं।
इस अदाकार व्यवस्था के पास वह क्षमता ही नहीं है, जो किसी दिखाई देने वाली नाकामी को बुनियादी बदलाव में बदल सके। इसके पास सिर्फ़ एक क्षमता है—दिखाई देने वाली नाकामी को पूरी खामोशी में बदल देने की।
लेकिन यह बीमारी सिर्फ़ भारत की नहीं है। हर परिपक्व अफ़सरशाही देर-सबेर यह समझ लेती है कि हकीकत बदलने से कहीं ज़्यादा सस्ता है ‘छवि’ का प्रबंधन करना। दुनिया भर के संस्थान अपनी मरम्मत करने से पहले इस बात को सँवारने में जुट जाते हैं कि वे बाहर से कैसे दिखाई दे रहे हैं। सरकारें नतीजों के बजाय घोषणाओं को मापती हैं। विश्वविद्यालय ज्ञान के बजाय डिग्रियों को मापते हैं। और कंपनियाँ दीर्घकालिक क्षमता के बजाय हर तीन महीने की घोषणाओं को सँवारती हैं।
आधुनिक समाज इस कला में माहिर हो चुके हैं कि वे बदलाव का केवल दिखावा करें, जबकि उस भीतरी ढाँचे को पूरी तरह सुरक्षित रखें, जो किसी भी वास्तविक बदलाव को होने ही नहीं देता।
यही वजह है कि सबसे बुद्धिमान समाज भी उन्हीं गलतियों को बार-बार दोहराते हैं, जिनकी वे पहले ही हजारों व्याख्याएँ कर चुके होते हैं। व्याख्या को ही सुधार मान लिया जाता है। पहचान को ही क्रांति मान लिया जाता है। और जान लेने को ही सीख मान लिया जाता है।
