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कंगना रनौत और शर्मिला टैगोर के बीच 'वंदे मातरम' पर गरमाया विवाद

हाल ही में 'वंदे मातरम' को लेकर कंगना रनौत और शर्मिला टैगोर के बीच एक विवाद उभरा है। शर्मिला ने सुझाव दिया कि केवल पहले दो छंद गाए जाने चाहिए, जबकि कंगना ने इस पर तीखी प्रतिक्रिया दी है। इस विवाद ने न केवल बॉलीवुड में बल्कि राजनीतिक और सांस्कृतिक हलकों में भी चर्चा को जन्म दिया है। जानें इस मुद्दे पर दोनों अभिनेत्रियों के विचार और उनके तर्क।
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राजनीतिक और सांस्कृतिक विवाद का नया मोड़

राष्ट्रीय गीत 'वंदे मातरम' को लेकर चल रहा राजनीतिक और सांस्कृतिक विवाद अब बॉलीवुड की दो प्रमुख अभिनेत्रियों के बीच टकराव के कारण और बढ़ गया है। कंगना रनौत, जो एक अभिनेत्री और सांसद भी हैं, ने शर्मिला टैगोर के हालिया बयानों पर तीखी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने शर्मिला से 'हिंदू-मुस्लिम सोच से बाहर आने' की अपील की।


शर्मिला टैगोर का बयान

81 वर्षीय शर्मिला टैगोर ने हाल ही में सुझाव दिया कि 'वंदे मातरम' के केवल पहले दो छंद गाए जाने चाहिए। उनका कहना था कि बाद के छंदों में हिंदू देवी-देवताओं का उल्लेख है, जो एकेश्वरवादी धर्मों के अनुयायियों के लिए स्वीकार करना कठिन हो सकता है। यह विचार कांग्रेस पार्टी के 1937 के निर्णय से मेल खाता है, जिसमें पार्टी कार्यक्रमों में केवल पहले दो पदों को गाने का प्रावधान था।


कंगना रनौत की प्रतिक्रिया

कंगना ने इंस्टाग्राम स्टोरीज़ पर एक वीडियो साझा करते हुए शर्मिला के विचारों पर अपनी असहमति जताई। उन्होंने कहा कि वह शर्मिला की चिंताओं का सम्मान करती हैं, लेकिन एक कलाकार के रूप में उनकी कविता की व्याख्या पर सवाल उठाया।


"मैं सराहना करती हूं कि शर्मिला जी ने 'वंदे मातरम' पर अपनी आपत्ति व्यक्त की है, लेकिन एक कलाकार के रूप में मैं हैरान हूं कि कला/कविता पर उनके विचार इतने सीमित और बनावटी कैसे हो सकते हैं।" कंगना ने आगे कहा कि कविता में शक्ति के संदर्भों को धार्मिक व्याख्याओं तक सीमित नहीं किया जाना चाहिए।


शर्मिला टैगोर का दृष्टिकोण

टैगोर की टिप्पणियाँ 'वंदे मातरम' के अर्थ और उसके महत्व को लेकर चल रही बहस के बीच आई हैं। यह गीत, जिसे बंकिम चंद्र चटर्जी ने 1870 के दशक में लिखा था, भारत की स्वतंत्रता संग्राम से गहराई से जुड़ा हुआ है।


टैगोर ने कहा कि शुरुआती दो पद मातृभूमि पर केंद्रित हैं, जबकि बाद के संदर्भ उन लोगों के लिए कठिनाई पैदा कर सकते हैं जो एकेश्वरवादी धर्मों में विश्वास करते हैं।


मुकेश खन्ना की राय

यह विवाद अभिनेता मुकेश खन्ना द्वारा 'जन गण मन' की जगह 'वंदे मातरम' को राष्ट्रगान बनाने की मांग के बाद शुरू हुआ। खन्ना ने पहले भी कहा था कि 'वंदे मातरम' को राष्ट्रगान का दर्जा दिया जाना चाहिए।


उन्होंने कहा, "मैंने तीन साल पहले ही कहा था कि 'वंदे मातरम' को राष्ट्रगान बनाया जाना चाहिए। 'जन गण मन' हमारे देश का राष्ट्रगान नहीं है।"


निष्कर्ष

'जन गण मन' भारत का राष्ट्रगान है, जबकि 'वंदे मातरम' को राष्ट्रगीत का दर्जा प्राप्त है। दोनों गीतों का देश के इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान है और ये स्वतंत्रता आंदोलन से गहराई से जुड़े हुए हैं।