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दिलजीत दोसांझ की फिल्म 'सतलुज' का ओटीटी पर धमाकेदार आगाज़

दिलजीत दोसांझ की बहुप्रतीक्षित फिल्म 'सतलुज', जो मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालरा के जीवन पर आधारित है, अब ZEE5 पर स्ट्रीमिंग के लिए उपलब्ध है। इस फिल्म का नाम पहले 'पंजाब '95' था, लेकिन विवादों के चलते इसे बदला गया। फिल्म में दिलजीत के साथ कई अन्य प्रमुख कलाकार भी हैं। जसवंत सिंह खालरा का लापता होना और उनके द्वारा उठाए गए मानवाधिकार मुद्दे इस फिल्म की कहानी को और भी महत्वपूर्ण बनाते हैं। जानें इस फिल्म के बारे में और इसके पीछे की सच्चाई।
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फिल्म 'सतलुज' की रिलीज

नई दिल्ली: दिलजीत दोसांझ की बहुप्रतीक्षित फिल्म 'सतलुज', जो लगभग तीन वर्षों तक सर्टिफिकेशन विवाद में फंसी रही, अब ओटीटी प्लेटफॉर्म ZEE5 पर स्ट्रीमिंग के लिए उपलब्ध है। यह फिल्म 3 जुलाई से दर्शकों के सामने आई है और रिलीज होते ही सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बन गई है। फिल्म मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालरा के जीवन और उनके संघर्ष पर आधारित है।


फिल्म का नाम परिवर्तन

इस फिल्म का प्रारंभिक नाम 'पंजाब '95' था, जिसे विवादों के चलते बदलकर 'सतलुज' रखा गया। निर्देशक हनी त्रेहान के अनुसार, सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन (CBFC) ने फिल्म में 127 कट लगाने की मांग की थी, जिससे इसकी रिलीज में देरी हुई। अब यह फिल्म बिना किसी कट के नए शीर्षक के साथ उपलब्ध है।


स्टारकास्ट की दमदार टीम

फिल्म में दिलजीत दोसांझ ने जसवंत सिंह खालरा का किरदार निभाया है। उनके साथ कंवलजीत सिंह, अर्जुन रामपाल, सुविंदर विक्की और गीतिका विद्या ओहलयान भी महत्वपूर्ण भूमिकाओं में हैं।


जसवंत सिंह खालरा का परिचय

जसवंत सिंह खालरा का जन्म 1952 में पंजाब के अमृतसर जिले के खालरा गांव में हुआ था। वे पहले एक बैंक कर्मचारी थे, लेकिन 1980 के दशक के अंत में मानवाधिकारों के मुद्दों पर काम करना शुरू किया। ऑपरेशन ब्लू स्टार, पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या और 1984 के सिख-विरोधी दंगों ने उन्हें गहराई से प्रभावित किया।


खालरा का लापता होना

1995 में, जसवंत सिंह खालरा रहस्यमय परिस्थितियों में लापता हो गए। विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार, उन्हें आखिरी बार अपने घर के बाहर देखा गया था, और आरोप है कि उन्हें पुलिसकर्मियों ने हिरासत में लिया था। यह मामला देश के चर्चित मानवाधिकार मामलों में से एक बन गया।


फिल्म का महत्व

'सतलुज' केवल एक फिल्म नहीं है, बल्कि यह पंजाब के उथल-पुथल भरे दौर और मानवाधिकारों से जुड़े संवेदनशील मुद्दों को बड़े पर्दे पर लाने का प्रयास है। यही कारण है कि इसकी रिलीज के साथ ही यह फिल्म एक बार फिर चर्चा का केंद्र बन गई है।