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जीवित्पुत्रिका व्रत 2023: माताओं की संतान के लिए विशेष पूजा का महत्व

जीवित्पुत्रिका व्रत, जिसे जितिया व्रत भी कहा जाता है, माताओं द्वारा अपने बच्चों की लंबी उम्र और सुखद जीवन के लिए मनाया जाता है। यह व्रत विशेष रूप से बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश में बड़े श्रद्धा से किया जाता है। इस लेख में जानें व्रत का महत्व, पूजा का शुभ समय, आवश्यक सामग्री और पारण का समय। माताओं के लिए यह अवसर संतान के सुख और स्वास्थ्य की प्रार्थना का है।
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जीवित्पुत्रिका व्रत का महत्व


नई दिल्ली: आज 3 अक्टूबर, शनिवार को जीवित्पुत्रिका व्रत मनाया जा रहा है। माताएं इस व्रत को अपने बच्चों की लंबी उम्र, स्वास्थ्य और सुखद जीवन के लिए करती हैं। इस दिन वे अन्न-जल का सेवन नहीं करतीं और भगवान जीमूतवाहन की पूजा करती हैं। यह व्रत विशेष रूप से बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश और आस-पास के क्षेत्रों में श्रद्धा के साथ मनाया जाता है।


व्रत की तिथि और समय

जितिया व्रत आश्विन महीने के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है। इस वर्ष अष्टमी 3 अक्टूबर को सुबह 7:59 बजे से शुरू होकर 4 अक्टूबर को सुबह 5:51 बजे तक रहेगी। उदया तिथि और प्रदोष काल के अनुसार, मुख्य व्रत आज ही रखा जा रहा है। कल 2 अक्टूबर को नहाय-खाय की रस्म पूरी की गई थी। आज महिलाएं निर्जला उपवास करेंगी और 4 अक्टूबर को पारण के साथ व्रत का समापन होगा।


पूजा का शुभ समय

भगवान जीमूतवाहन की पूजा का समय


भगवान जीमूतवाहन की पूजा शाम को प्रदोष काल में की जाती है। आज यह समय लगभग 6:05 बजे से 8:29 बजे तक रहेगा। इस दौरान व्रत कथा का श्रवण और आरती की जाती है। व्रत का संकल्प लेने का अभिजीत मुहूर्त सुबह 11:46 बजे से 12:34 बजे तक है। विभिन्न शहरों में मुहूर्त का समय थोड़ा भिन्न हो सकता है।


पूजा की सामग्री

पूजा में उपयोग होने वाली सामग्री


पूजा की सामग्री क्षेत्र और परिवार की परंपरा के अनुसार भिन्न हो सकती है। आमतौर पर पूजा में भगवान जीमूतवाहन की प्रतिमा या तस्वीर, कुश, गोबर, धूप, दीप, रोली, सिंदूर, अक्षत, फूल, फल और प्रसाद का उपयोग किया जाता है। कई स्थानों पर महिलाएं घर के आंगन में एक छोटा तालाब बनाकर उसमें जीमूतवाहन की पूजा करती हैं।


पारण का समय

पारण कब होगा?


व्रत का पारण 4 अक्टूबर, रविवार को किया जाएगा। पंचांग के अनुसार, सुबह 7:28 बजे के बाद पारण किया जा सकता है। पूजा-पाठ के बाद महिलाएं भोजन ग्रहण करेंगी। ध्यान रखें कि व्रत के नियम और पूजा की विधि विभिन्न क्षेत्रों और परिवारों में भिन्न हो सकती है, इसलिए अपनी पारिवारिक परंपरा के अनुसार पूजा करें।