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जुलाई में रवि प्रदोष व्रत: महत्व और पूजा विधि

जुलाई में मनाए जाने वाले रवि प्रदोष व्रत का विशेष महत्व है। यह व्रत भगवान शिव को समर्पित है और इसे करने से भक्तों को अनजाने में किए गए पापों से मुक्ति मिलती है। जानें इस व्रत का शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और इसके लाभ। इस व्रत के दौरान भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं।
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प्रदोष व्रत का महत्व

हिंदू धर्म में प्रदोष व्रत का एक विशेष स्थान है, जो भगवान शिव को समर्पित है। इस वर्ष जुलाई का पहला प्रदोष व्रत रविवार, 12 जुलाई को मनाया जाएगा। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस व्रत को करने से भक्तों को भगवान शिव और माता पार्वती की कृपा प्राप्त होती है, जिससे उनकी सभी इच्छाएं पूरी होती हैं।


रवि प्रदोष व्रत का शुभ मुहूर्त

हिंदू पंचांग के अनुसार, त्रयोदशी तिथि 11 जुलाई को रात 2:05 बजे से शुरू होगी और 12 जुलाई को रात 10:31 बजे समाप्त होगी। इस दिन प्रदोष व्रत का आयोजन किया जाएगा। मान्यता है कि जब त्रयोदशी तिथि प्रदोष काल में आती है, तब व्रत का महत्व और बढ़ जाता है।


रवि प्रदोष व्रत की पूजा विधि

- प्रदोष व्रत के दिन सूर्योदय से पहले उठें और स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें।


- इसके बाद अपने घर के मंदिर में पूजा करें, सूर्य देव को जल अर्पित करें और व्रत का संकल्प लें।


- प्रदोष काल में भगवान शिव के मंदिर जाकर उनका अभिषेक करें और उन्हें धतूरा, अक्षत, शहद, फूल, चंदन, माला और बेलपत्र अर्पित करें।


- फिर घी का दीपक जलाएं और रवि प्रदोष व्रत कथा का पाठ करें।


- अंत में भगवान शिव की आरती करें और उन्हें भोग लगाएं, इसके बाद व्रत का पारण करें।


रवि प्रदोष व्रत के लाभ

शिव पुराण के अनुसार, रवि प्रदोष व्रत करने से व्यक्ति को अनजाने में किए गए पापों से मुक्ति मिलती है। इसके साथ ही पारिवारिक जीवन में सुख, शांति और समृद्धि बनी रहती है। प्रदोष काल में भगवान शिव कैलाश पर्वत पर प्रसन्न मुद्रा में होते हैं, और इस समय जो भक्त श्रद्धा से पूजा करता है, उसकी सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं।