धनतेरस: समृद्धि और स्वास्थ्य का पर्व
धनतेरस का महत्व
कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को धनतेरस का पर्व मनाया जाता है, जिसे धन त्रयोदशी और धन्वंतरी त्रयोदशी भी कहा जाता है। इस दिन देवी लक्ष्मी, भगवान गणेश, ब्रह्मा, विष्णु और महेश की पूजा की जाती है। मान्यता है कि समुद्र मंथन के दौरान माता लक्ष्मी का अवतरण हुआ था, जिसके प्रतीक के रूप में बर्तन खरीदने की परंपरा शुरू हुई।
इस वर्ष धनतेरस का पर्व 6 नवंबर को मनाया जाएगा। ज्योतिषाचार्य डा. अनीष व्यास के अनुसार, धनवंतरी की जयंती भी इसी दिन होती है। इस दिन बर्तन खरीदने से धन में वृद्धि होती है और यह दिन दिवाली के त्योहार की शुरुआत भी करता है।
यमदीप की परंपरा
धनतेरस पर यमदीप जलाने की परंपरा भी है, जो रोग, शोक और मृत्यु से बचाने के लिए होती है। इस दिन यमराज के लिए दीप जलाने से घर में सुख-समृद्धि बनी रहती है।
इस दिन लक्ष्मी जी के स्वागत के लिए रंगोली बनाना और महालक्ष्मी के पद चिन्ह लगाना भी महत्वपूर्ण होता है।
धनतेरस पर पूजा सामग्री
धनतेरस पर पूजा में पान, सुपारी, साबुत धनिया, बताशा, खील और कपूर का उपयोग किया जाता है। पान के पत्ते देवी-देवताओं का वास मानते हैं, जबकि सुपारी को विभिन्न देवताओं का प्रतीक माना जाता है।
साबुत धनिया को मां लक्ष्मी के सामने अर्पित करने से आर्थिक परेशानियों का समाधान होता है।
धनतेरस पर खरीदारी
धनतेरस के दिन सोना, चांदी, तांबा और अन्य धातुओं की खरीदारी शुभ मानी जाती है। कुबेर यंत्र खरीदने से भी धन की कमी दूर होती है।
इस दिन झाडू खरीदने से नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है और लक्ष्मी का वास होता है।
धनतेरस का पौराणिक महत्व
पौराणिक कथा के अनुसार, लक्ष्मी जी ने एक किसान की सेवा की थी, जिसके बाद से धनतेरस पर उनकी पूजा की जाने लगी। इसी दिन यमराज की पूजा भी होती है, जो अकाल मृत्यु से बचाने का उपाय बताती है।
