नरक चतुर्दशी: दीपोत्सव का दूसरा पर्व और इसकी धार्मिक महत्ता
नरक चतुर्दशी का महत्व
कार्तिक कृष्ण पक्ष में मनाए जाने वाले पांच दिवसीय दीपोत्सव का दूसरा पर्व नरक चतुर्दशी है, जिसे छोटी दीपावली, रूप चतुर्दशी और काली चौदस के नाम से भी जाना जाता है। यह पर्व धनतेरस के बाद आता है और धार्मिक आस्था, पौराणिक मान्यताओं और आध्यात्मिक संदेशों का अनूठा संगम प्रस्तुत करता है। 'नरक चतुर्दशी' नाम से ही स्पष्ट होता है कि इसका संबंध मृत्यु के देवता यमराज और नरक से मुक्ति की मान्यता से जुड़ा है। इस दिन यमराज की पूजा, व्रत और दीपदान करने से अकाल मृत्यु का भय दूर होता है और मनुष्य को नरक की यातनाओं से मुक्ति मिलती है। यह पर्व बुराई पर अच्छाई, अत्याचार पर न्याय और अंधकार पर प्रकाश की विजय का प्रतीक है।
विशेष अनुष्ठान और परंपराएं
इस दिन अभ्यंग स्नान का विशेष महत्व है। मान्यता है कि सूर्योदय से पूर्व तिल के तेल से उबटन करने और स्नान करने से रूप, सौंदर्य और स्वास्थ्य की प्राप्ति होती है। इसी कारण इसे रूप चतुर्दशी भी कहा जाता है। इस दिन घरों की सफाई, दीप जलाना, हनुमान जी की पूजा और यमराज के लिए दीपदान करने की परंपरा भी है। विशेष रूप से घर के बाहर दक्षिण दिशा में दीपक जलाकर यमराज से परिवार की सुख-समृद्धि और दीर्घायु की कामना की जाती है।
इस वर्ष की तिथि और पूजा विधि
इस वर्ष चतुर्दशी तिथि दो दिन रहने के कारण पर्व की तिथि को लेकर असमंजस की स्थिति है। कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी 7 नवंबर को सुबह 10:47 बजे से प्रारंभ होकर 8 नवंबर को सुबह 11:27 बजे तक रहेगी। प्रदोष काल में चतुर्दशी तिथि होने के कारण यम दीपदान, हनुमान पूजा और काली चौदस की पूजा 7 नवंबर को की जाएगी, जबकि उदयातिथि के अनुसार 8 नवंबर की सुबह अभ्यंग स्नान होगा। नरक चतुर्दशी केवल धार्मिक कर्मकांड का पर्व नहीं है, बल्कि यह जीवन से नकारात्मकता, अहंकार और बुराइयों को दूर कर सद्गुणों का प्रकाश फैलाने की प्रेरणा भी देता है।
पौराणिक कथा और मान्यताएं
नरक चतुर्दशी के साथ भगवान श्रीकृष्ण द्वारा नरकासुर के वध की पौराणिक कथा भी जुड़ी हुई है। मान्यता है कि भगवान श्रीकृष्ण ने इसी दिन प्रागज्योतिषपुर के राजा नरकासुर का वध किया था, जिससे पृथ्वीवासियों और देवताओं को उसके अत्याचारों से मुक्ति मिली। नरकासुर ने 16000 कन्याओं को बंदी बना रखा था। भगवान श्रीकृष्ण ने सत्यभामा के सहयोग से नरकासुर का संहार किया और कन्याओं को मुक्त किया। इस खुशी में देवगण और पृथ्वीवासी इस पर्व को मनाते हैं।
दीप जलाने की परंपरा
धनतेरस, नरक चतुर्दशी और दीवाली के दिन दीप जलाने की परंपरा का संबंध वामन भगवान के तीन पगों से है। इन दिनों में लोग यम यातना से मुक्ति पाने के लिए दीप जलाते हैं और मां लक्ष्मी की पूजा करते हैं। यह भी मान्यता है कि इस दिन सूर्योदय से पूर्व स्नान करने से पुण्य मिलता है।
