निर्जला एकादशी: महत्व, तिथि और पूजा विधि
निर्जला एकादशी का व्रत 24 जून 2026 को मनाया जाएगा, जो विशेष महत्व रखता है। इस दिन बिना जल के व्रत करने से सभी 24 एकादशियों का पुण्य मिलता है। जानें इस दिन की तिथि, मुहूर्त और पूजा विधि के बारे में विस्तार से। महिलाएं इस व्रत को परिवार की खुशहाली के लिए करती हैं। पूजा विधि में भगवान विष्णु की आराधना और मंत्रों का जाप शामिल है।
| Jun 25, 2026, 09:43 IST
निर्जला एकादशी का महत्व
ज्येष्ठ माह के शुक्ल पक्ष में आने वाली निर्जला एकादशी का विशेष महत्व है। इस वर्ष, यह व्रत 24 जून 2026 को शुभ संयोग में मनाया जा रहा है। शास्त्रों के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति निर्जला एकादशी का व्रत बिना जल के करता है, तो उसे पूरे वर्ष की सभी 24 एकादशियों के समान पुण्य प्राप्त होता है। महिलाएं इस व्रत को परिवार की खुशहाली और अखंड सौभाग्य के लिए करती हैं। आइए, इस दिन की तिथि, मुहूर्त, पूजा विधि और महत्व के बारे में विस्तार से जानते हैं...
तिथि और मुहूर्त
द्रिक पंचांग के अनुसार, 24 जून की शाम 06:12 बजे एकादशी तिथि की शुरुआत होगी। यह तिथि 25 जून 2026 की रात 08:09 बजे समाप्त होगी। उदयातिथि के अनुसार, इस दिन निर्जला एकादशी का व्रत किया जाएगा।
पूजन विधि
इस दिन सुबह जल्दी स्नान करके साफ कपड़े पहनें। पूजा स्थल की अच्छी तरह सफाई करें। फिर हाथ में जल और फूल लेकर निर्जला एकादशी का संकल्प लें। एक चौकी पर पीला कपड़ा बिछाकर भगवान विष्णु की प्रतिमा स्थापित करें। इसके बाद पंचामृत से श्रीहरि का अभिषेक करें। भगवान विष्णु को चंदन, अक्षत, पीले पुष्प, हल्दी, तुलसी, धूप, दीप, फल, पान, सुपारी और वस्त्र अर्पित करें।
पूजा के दौरान पूरी श्रद्धा से विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करें या सुनें। घी का दीपक जलाकर आरती करें और पूजा के बाद जल से भरा मिट्टी का कलश दान करें। इस दिन निराहार रहकर व्रत करें और भजन-कीर्तन में समय बिताएं। शाम को पुनः भगवान विष्णु की पूजा करें और संभव हो तो रात्रि जागरण करें। अगले दिन स्नान के बाद पूजा समाप्त करके यथासंभव दान दें और ब्राह्मण को भोजन कराएं। फिर व्रत का पारण करें।
मंत्र
ॐ नमोः भगवते वासुदेवाय॥
ॐ श्री विष्णवे च विद्महे वासुदेवाय धीमहि तन्नो विष्णुः प्रचोदयात्॥
ॐ ह्रीं कार्तविर्यार्जुनो नाम राजा बाहु सहस्त्रवान।
यस्य स्मरेण मात्रेण ह्रतं नष्टं च लभ्यते।।
शान्ताकारम् भुजगशयनम् पद्मनाभम् सुरेशम्, विश्वाधारम् गगनसदृशम् मेघवर्णम् शुभाङ्गम्।
लक्ष्मीकान्तम् कमलनयनम् योगिभिर्ध्यानगम्यम् , वन्दे विष्णुम् भवभयहरम् सर्वलोकैकनाथम्॥
मङ्गलम् भगवान विष्णुः, मङ्गलम् गरुणध्वजः। मङ्गलम् पुण्डरी काक्षः, मङ्गलाय तनो हरिः॥
