प्रद्युम्न चतुर्थी: पूजा विधि और महत्व
प्रद्युम्न चतुर्थी का पर्व हिंदू धर्म में विशेष महत्व रखता है। इस दिन भगवान गणेश की पूजा से जीवन में आने वाली बाधाएं दूर होती हैं और मानसिक शांति प्राप्त होती है। जानें इस पर्व का महत्व, पूजा विधि और इससे जुड़े लाभ। इस बार प्रद्युम्न चतुर्थी पर शुभ संयोग भी बन रहे हैं, जिससे इसका महत्व और बढ़ गया है।
| Jun 18, 2026, 11:19 IST
प्रद्युम्न चतुर्थी का महत्व
आज प्रद्युम्न चतुर्थी का पर्व है, जो हिंदू धर्म में विशेष महत्व रखता है। इस दिन भगवान गणेश की पूजा करने से जीवन में आने वाली बाधाएं दूर होती हैं और मानसिक शांति प्राप्त होती है। आइए, जानते हैं प्रद्युम्न चतुर्थी के व्रत का महत्व और पूजा की विधि।
प्रद्युम्न चतुर्थी के बारे में जानकारी
हिंदू धर्म में हर चतुर्थी तिथि का धार्मिक महत्व है। यह तिथि भगवान गणेश की पूजा के लिए समर्पित होती है। चतुर्थी के दिन गणपति बप्पा की आराधना से सभी विघ्न समाप्त होते हैं और सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है। जून में आने वाली चतुर्थी को प्रद्युम्न चतुर्थी कहा जाता है। 'प्रद्युम्न' का अर्थ है तेजस्वी और ऊर्जा से भरा। इस दिन भगवान गणेश की पूजा करने से सकारात्मकता बढ़ती है और नकारात्मक भावनाओं पर नियंत्रण पाने की शक्ति मिलती है। इस बार प्रद्युम्न चतुर्थी पर सर्वार्थ सिद्धि योग और गुरु पुष्य योग जैसे शुभ संयोग भी बन रहे हैं, जिससे इसका महत्व और बढ़ गया है।
प्रद्युम्न चतुर्थी का शुभ मुहूर्त
हिंदू पंचांग के अनुसार, इस वर्ष प्रद्युम्न चतुर्थी का आरंभ 17 जून की रात 9:38 बजे से होगा और इसका समापन 18 जून की शाम 6:58 बजे होगा। इसलिए, उदया तिथि को ध्यान में रखते हुए प्रद्युम्न चतुर्थी का व्रत 18 जून, गुरुवार को रखा जाएगा।
भगवान गणेश की पूजा विधि
पंडितों के अनुसार, प्रद्युम्न चतुर्थी के दिन सुबह जल्दी स्नान करें और साफ वस्त्र पहनें। फिर व्रत का संकल्प लें। मंदिर में लाल या पीला वस्त्र बिछाकर गणेश जी की प्रतिमा स्थापित करें और दीपक जलाएं। भगवान गणेश को लाल चंदन का तिलक लगाएं, अक्षत अर्पित करें और दूर्वा चढ़ाएं। इसके बाद मोदक, लड्डू या अन्य मिठाइयों का भोग लगाएं। पूजा के दौरान 'ॐ गं गणपतये नमः' मंत्र का जाप करें और व्रत कथा का पाठ करें। अंत में कपूर या दीपक से गणेश जी की आरती करें और अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति की प्रार्थना करें। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, प्रद्युम्न चतुर्थी पर विधिपूर्वक पूजा करने वाले भक्तों पर भगवान गणेश की विशेष कृपा बनी रहती है।
दूर्वा चढ़ाने के लाभ
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, चतुर्थी की पूजा बिना दूर्वा के अधूरी मानी जाती है। भगवान गणेश को 21 दूर्वा चढ़ाने से शारीरिक कष्ट दूर होते हैं और जीवन में सुख-शांति बनी रहती है। मानसिक तनाव का सामना कर रहे व्यक्तियों को प्रद्युम्न चतुर्थी के दिन भगवान गणेश की पूजा करनी चाहिए।
प्रद्युम्न चतुर्थी की पौराणिक कथा
प्राचीन समय में अनलसुर नामक राक्षस ने देवताओं और मुनियों को परेशान किया। इस राक्षस से बचने के लिए देवी-देवता भगवान शिव और गणेश जी के पास पहुंचे। भगवान शिव ने अनलसुर से युद्ध किया और गणेश जी ने उसे निगल लिया। इस घटना के बाद ऋषि कश्यप ने गणेश जी को दूर्वा खाने की सलाह दी, जिससे दूर्वा गणेश जी की प्रिय वस्तु बन गई।
व्रत खोलने का नियम
पुराणों के अनुसार, चतुर्थी के अगले दिन यानी पंचमी तिथि को सुबह किसी ब्राह्मण या जरूरतमंद को भोजन/दान देने के बाद ही व्रत खोलना चाहिए।
प्रद्युम्न चतुर्थी का धार्मिक महत्व
स्कंदपुराण, गणेशपुराण और मुद्गलपुराण में इस व्रत की महिमा का वर्णन है। जो भक्त इस दिन श्रद्धा से व्रत रखते हैं, उनके जीवन के संकट दूर होते हैं। यह व्रत पारिवारिक सुख-शांति, समृद्धि और मानसिक तनाव से मुक्ति के लिए उत्तम माना गया है।
