महालक्ष्मी व्रत का समापन: विधि और महत्व
महालक्ष्मी व्रत का समापन
आज, 03 अक्टूबर को, 16 दिवसीय महालक्ष्मी व्रत का समापन हो रहा है, जिसकी शुरुआत 19 सितंबर 2026 को हुई थी। यह व्रत मां लक्ष्मी की कृपा प्राप्त करने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस व्रत का उद्यापन करना आवश्यक होता है। व्रत की समाप्ति पर कलश विसर्जन का भी विशेष महत्व है। आइए, जानते हैं महालक्ष्मी व्रत का मुहूर्त और उद्यापन विधि के बारे में...
कलश विसर्जन का मुहूर्त
इस वर्ष, महालक्ष्मी व्रत का समापन 03 अक्टूबर को हो रहा है। इस दिन प्रातःकाल का मुहूर्त सुबह 06:15 से 10:45 बजे तक है। वहीं, अभिजीत मुहूर्त दोपहर 11:48 से 12:35 बजे तक रहेगा।
महालक्ष्मी व्रत का उद्यापन कैसे करें
इस दिन, सबसे पहले सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ कपड़े पहनें। फिर घर के मंदिर में ईशान कोण में लकड़ी की चौकी रखें और उस पर लाल या पीला कपड़ा बिछाएं। इसके बाद, मां महालक्ष्मी की तस्वीर या गजलक्ष्मी स्वरूप की प्रतिमा स्थापित करें।
चौकी पर चावल की ढेरी बनाएं और उस पर जल से भरा कलश रखें। कलश पर आम के पत्ते और नारियल रखें। अब मां लक्ष्मी की विधिपूर्वक पूजा करें। यदि आपने पहले से कलश स्थापित किया है, तो इस प्रक्रिया को दोहराने की आवश्यकता नहीं है।
व्रत के पहले दिन बांधा गया 16 गांठों वाला पवित्र धागा मां महालक्ष्मी के सामने अर्पित करें और उस पर रोली और अक्षत चढ़ाएं। फिर मां महालक्ष्मी को कमल का फूल, 16 श्रृंगार की सामग्री और लाल वस्त्र अर्पित करें। भोग में फल, खीर और पूड़ी चढ़ाएं।
महालक्ष्मी व्रत के उद्यापन के दिन हवन करने की परंपरा है। हवन के समय 'ऊँ महालक्ष्म्यै नम:' मंत्र का जाप करते हुए 108 आहुति दें। अंत में खीर और पूरियों की आहुति दें। फिर 16 घी के दीपक जलाएं और मां महालक्ष्मी तथा भगवान गणेश की आरती करें। साथ ही पूजा में हुई भूल-चूक के लिए क्षमा मांगें।
उद्यापन के दिन 16 कन्याओं या 16 सुहागिन महिलाओं को भोजन कराएं और सामर्थ्य के अनुसार श्रृंगार सामग्री, वस्त्र, फल और दक्षिणा देकर विदा करें।
कलश विसर्जन की विधि
व्रत के अंतिम दिन मां महालक्ष्मी की विधिपूर्वक पूजा करें। फिर कलश पर हाथ रखकर भगवान वरुण देव और पूजा में आमंत्रित सभी देवी-देवताओं से सम्मानपूर्वक विदाई के लिए प्रार्थना करें।
अब कलश का जल पूरे घर में आम के पत्तों से छिड़कें और बचे हुए जल को तुलसी के पौधे में डाल दें।
कलश पर रखा नारियल प्रसाद के रूप में परिवार के सदस्यों में बांटें और पूजा सामग्री का विसर्जन कर दें।
16 गांठ वाला डोरा
इस व्रत में 16 गांठ वाले डोरे का विशेष महत्व है। पूजा समाप्त होने के बाद इस डोरे को फेंकने के बजाय तिजोरी या पूजा स्थान पर रखें।
यदि डोरा पुराना हो जाए या रखने योग्य न हो, तो इसे किसी पवित्र स्थान पर रखें या बहते जल में प्रवाहित कर दें।
