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संकष्टी चतुर्थी: पूजा विधि और महत्व

संकष्टी चतुर्थी का व्रत हर महीने कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाया जाता है, जो भगवान गणेश को समर्पित है। इस दिन श्रद्धा से पूजा करने से जीवन की परेशानियाँ दूर होती हैं और सुख-समृद्धि का आगमन होता है। इस वर्ष, गजानन संकष्टी चतुर्थी का व्रत 02 अगस्त को है। जानें इस दिन की तिथि, मुहूर्त, पूजा विधि और मंत्र के बारे में विस्तार से।
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संकष्टी चतुर्थी का महत्व

हिंदू धर्म में हर महीने कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को संकष्टी चतुर्थी का व्रत किया जाता है। यह व्रत भगवान गणेश को समर्पित होता है। सावन महीने में आने वाली संकष्टी चतुर्थी को गजानन संकष्टी चतुर्थी कहा जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन श्रद्धा और भक्ति से भगवान गणेश की पूजा करने से जीवन की सभी परेशानियाँ दूर होती हैं और सुख-समृद्धि का आगमन होता है। इस वर्ष, गजानन संकष्टी चतुर्थी का व्रत 02 अगस्त को मनाया जा रहा है। आइए जानते हैं इस दिन की तिथि, मुहूर्त, पूजा विधि और मंत्र के बारे में...


तिथि और मुहूर्त

वैदिक पंचांग के अनुसार, 01 अगस्त की रात 11:07 बजे से सावन कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि प्रारंभ हुई है। यह तिथि 02 अगस्त की सुबह 11:15 बजे समाप्त होगी। इसलिए, उदयातिथि के अनुसार, 02 अगस्त को संकष्टी चतुर्थी का व्रत किया जाएगा।


पूजन विधि

इस दिन सुबह जल्दी स्नान करके साफ कपड़े पहनें। फिर भगवान गणेश का ध्यान करते हुए व्रत का संकल्प लें। शाम को पूजा स्थान पर लकड़ी की चौकी रखकर उस पर लाल कपड़ा बिछाएं और भगवान गणेश की प्रतिमा स्थापित करें। इसके बाद धूप-दीप जलाएं और भगवान को चंदन, रोली और फूल अर्पित करें।


भगवान गणेश को मोदक या लड्डू का भोग लगाएं और दूर्वा अर्पित करें। इसके बाद संकष्टी व्रत कथा का पाठ करें और आरती करें। चंद्रमा निकलने पर दूध, जल, फूल और अक्षत मिलाकर चंद्रदेव को अर्घ्य दें। अंत में प्रसाद ग्रहण करके व्रत का पारण करें।


मंत्र

वक्रतुंड महाकाय, सूर्यकोटि समप्रभ, निर्विघ्नम कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा।।


ॐ गण गणपतए नमः।।


गजाननं भूतगणादि सेवितं, कपित्थ जंबू फल चारु भक्षणम, उमा शतम् शोक विनाश कार्यक्रम, नमामि विघ्नेश्वर पाद पंकजम।।