हरतालिका तीज: पूजा विधि, तिथि और धार्मिक महत्व
हरतालिका तीज का महत्व
हर साल भाद्रपद माह की शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को हरतालिका तीज का व्रत मनाया जाता है। इस दिन महिलाएं निर्जला व्रत रखती हैं और विधिपूर्वक शिव परिवार की पूजा करती हैं। यह व्रत हिंदू धर्म के सबसे कठिन व्रतों में से एक माना जाता है, क्योंकि इसमें 23 घंटे तक बिना कुछ खाए-पिए रहना होता है। इस दिन भगवान शिव और माता पार्वती की मिट्टी से बनी मूर्ति की पूजा की जाती है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, माता पार्वती ने महादेव को पति के रूप में पाने के लिए बालू और शुद्ध मिट्टी से शिवलिंग बनाकर कठोर तप किया था। आइए, हरतालिका तीज की तिथि, मुहूर्त, पूजा विधि और धार्मिक मान्यता के बारे में विस्तार से जानते हैं...
तिथि और मुहूर्त
तिथि और मुहूर्त
हिंदू पंचांग के अनुसार, भाद्रपद शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि 13 सितंबर को सुबह 7:08 बजे से प्रारंभ होगी और 14 सितंबर 2026 को सुबह 7:06 बजे समाप्त होगी। इस प्रकार, हरतालिका तीज का व्रत 14 सितंबर 2026 को मनाया जाएगा। पूजा के लिए शुभ मुहूर्त सुबह 6:05 बजे से 7:06 बजे तक रहेगा।
पूजन विधि
पूजन विधि
इस दिन सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र पहनें। फिर हाथों में फूल और अक्षत लेकर व्रत का संकल्प लें और पूरे दिन निर्जला व्रत रखें। इसके बाद विधिपूर्वक भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा करें। शाम को प्रदोष काल के लिए पूजा की तैयारी करें। माता पार्वती और भगवान शिव की मिट्टी की मूर्ति को बनाने के लिए केले और आम के पत्तों से चौकी सजाएं। प्रदोष काल में भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा आरंभ करें। चौकी पर मूर्तियों को स्थापित करें और जल से आचमन करके पूजा प्रारंभ करें।
माता पार्वती को फूल, माला, सिंदूर, कुमकुम और सोलह श्रृंगार की सामग्री अर्पित करें। भोलेनाथ को बेलपत्र, धतूरा, सफेद चंदन, धतूरे का फूल, फूल, माला, धोती और अंगोछा अर्पित करें। फिर शिव-पार्वती को भोग लगाएं और जल अर्पित करें। इसके बाद धूप-दीप जलाकर हरतालिका व्रत कथा का पाठ करें और पूजा के अंत में आरती करें। रातभर जागरण करें और अगले दिन सुबह पूजा-पाठ करके व्रत का पारण करें। मिट्टी की शिव-पार्वती की प्रतिमा को जल में प्रवाहित कर दें।
धार्मिक मान्यता
धार्मिक मान्यता
हरतालिका तीज व्रत को तपस्या और निष्ठा से जोड़ा जाता है। धार्मिक मान्यता है कि विवाहित महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र और अखंड सौभाग्य के लिए यह व्रत करती हैं, जबकि कुंवारी लड़कियां मनचाहे और योग्य वर की कामना के लिए यह व्रत करती हैं।
