हरतालिका व्रत: देवी पार्वती की तपस्या की अद्भुत कथा
हरतालिका व्रत का महत्व
हर साल भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को हरतालिका व्रत मनाया जाता है। इस अवसर पर भगवान शिव और माता पार्वती की विशेष पूजा की जाती है। यह व्रत मां पार्वती के कठोर तप और शिव-पार्वती के पवित्र मिलन का प्रतीक है। सभी जानते हैं कि देवी पार्वती ने महादेव को पति के रूप में पाने के लिए कई वर्षों तक कठिन तप किया था। इस लेख में हम जानेंगे कि देवी पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए कितने वर्षों तक तप किया और इस संबंध में क्या कथा है।
पार्वती का तप
पौराणिक कथाओं के अनुसार, देवी पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए हजारों वर्षों तक कठिन तपस्या की। पुराणों में वर्णित है कि उन्होंने विभिन्न चरणों में तप किया। देवी पार्वती की अडिग भक्ति और प्रेम ने यह सिद्ध कर दिया कि सच्ची निष्ठा और विश्वास से असंभव को भी संभव बनाया जा सकता है।
सती रूप में त्याग
पिछले जन्म में देवी पार्वती माता सती थीं। सती रूप में अपने शरीर का त्याग करने के बाद, उन्होंने हिमालय पर्वत पर पुत्री के रूप में जन्म लिया। बचपन से ही उनका महादेव के प्रति गहरा प्रेम था और उन्होंने देवर्षि नारद के मार्गदर्शन में भगवान शिव को पति रूप में पाने का संकल्प लिया। देवी पार्वती ने राजसी सुख-सुविधाओं का त्याग कर जंगलों में कठोर साधना शुरू की।
तपस्या की कठिनाई
शुरुआत में देवी पार्वती ने कंद-मूल और फल खाकर तप किया। समय के साथ, उन्होंने फलों का भी त्याग कर दिया और केवल सूखे पत्ते खाकर व्रत किया। अंत में, उन्होंने पत्तों का भी सेवन छोड़ दिया और केवल जल और वायु पर निर्भर रहने लगीं, जिससे उनका शरीर अत्यंत कमजोर हो गया।
हरतालिका तीज की कथा
भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया और हस्त नक्षत्र के दिन, देवी पार्वती ने पूरे दिन निराहार रहकर बालू से शिवलिंग का निर्माण किया। उन्होंने रातभर जागकर महादेव की पूजा की और कठिन निर्जला व्रत किया। इस दौरान उन्होंने सूखे बेलपत्र भी नहीं खाए, जिसके कारण उनका नाम 'अपर्णा' पड़ा, जिसका अर्थ है ऐसा व्यक्ति जिसने पत्ते भी न खाए हों।
हरतालिका व्रत का नामकरण
देवी पार्वती की इस अदम्य तपस्या, बालू के शिवलिंग की पूजा और अटूट संकल्प से तीनों लोक और स्वयं महादेव की समाधि हिल उठी। भगवान शिव ने प्रकट होकर देवी पार्वती की तपस्या को स्वीकार किया और उन्हें अपनी पत्नी के रूप में पाने का वरदान दिया। इस व्रत का नाम 'हरतालिका व्रत' इसलिए पड़ा क्योंकि देवी पार्वती ने अपनी सखी द्वारा अपहरण कर सुरक्षित रखा गया था और उन्होंने ताली के साथ मिलकर यह व्रत किया।
