लोहगढ़ किला: इतिहास और रोमांच का अद्भुत संगम
परिचय
हाल के दिनों में लोहगढ़ किले का नाम हर जगह सुनाई दे रहा है। केतन अग्रवाल की दुखद मृत्यु के बाद यह किला चर्चा का विषय बन गया है। इस घटना के बाद से लोग लोहगढ़ किले के बारे में अधिक जानने के इच्छुक हैं। यदि आप इतिहास के प्रति रुचि रखते हैं या एडवेंचर के शौकीन हैं, तो यह लेख आपके लिए है। हम इस लेख में महाराष्ट्र के गर्व लोहगढ़ किले से जुड़ी कुछ रोचक जानकारियाँ साझा करेंगे।
आयरन फोर्ट
लोहगढ़ किला महाराष्ट्र की सह्याद्री पर्वतमाला में स्थित है। यह भारत के ऐतिहासिक गौरव का प्रतीक है। समुद्र तल से लगभग 3,389 फीट की ऊंचाई पर स्थित, इसे 'आयरन फोर्ट' के नाम से भी जाना जाता है। इस किले का इतिहास और वास्तुकला सदियों पुरानी है, और यह आज भी ट्रैकर्स और पर्यटकों को आकर्षित करता है।
इतिहास और साम्राज्य
लोहगढ़ किला कई राजवंशों का गवाह रहा है। इसे सबसे पहले 10वीं शताब्दी में 'लोहतमिया राजवंश' द्वारा बनवाया गया था। इसके बाद राष्ट्रकूट, चालुक्य, बहमनी, यादव, निजाम, मुगल और मराठा शासकों ने इस पर राज किया।
छत्रपति शिवाजी महाराज ने 1648 में इस किले पर कब्जा कर लिया, लेकिन 1665 में पुरंदर की संधि के तहत इसे मुगलों को सौंपना पड़ा। शिवाजी ने 1670 में इसे पुनः जीतकर खजाने को सुरक्षित रखने के लिए इसका उपयोग किया।
पेशवा काल में नाना फडणवीस ने इस किले में शरण ली और यहां एक बड़ा जलाशय और बावड़ी का निर्माण कराया, जो आज भी मौजूद हैं।
जैन धर्म का संबंध
सितंबर 2019 में पुणे के ट्रैकर्स के एक समूह ने किले के दक्षिणी हिस्से में जैन ब्राह्मी लिपि में एक शिलालेख खोजा। यह शिलालेख पहली या दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व का है, जो दर्शाता है कि यह किला कभी जैन धर्म का पवित्र स्थल था।
किले की वास्तुकला
लोहगढ़ किले की संरचना और सैन्य डिज़ाइन अद्वितीय है। इसमें चार भव्य प्रवेश द्वार हैं: गणेश दरवाजा, नारायण दरवाजा, हनुमान दरवाजा और महा दरवाजा, जो आज भी सुरक्षित हैं। किले पर की गई नक्काशी प्राचीन इंजीनियरिंग कौशल को दर्शाती है।
किले का सबसे रोमांचक हिस्सा 'Vinchu Kada' है, जो बिच्छू की पूंछ के समान दिखता है। यहां से सह्याद्री की पहाड़ियों का दृश्य मनमोहक है।
ट्रैकिंग का अनुभव
लोहगढ़ की चढ़ाई रोमांचक और आसान है। इसका सबसे सरल मार्ग मलावली रेलवे स्टेशन से शुरू होता है, जो लगभग 10 किमी दूर है। इस ट्रैकिंग में 2 से 3 घंटे लगते हैं और रास्ते में प्राचीन 'भाजा गुफाएं' भी आती हैं।
यदि आप अधिक चलना नहीं चाहते, तो लोहगढ़वाड़ी गांव से किले के बेस तक सड़क उपलब्ध है।
सही समय यात्रा के लिए
अक्टूबर से मार्च का समय लोहगढ़ किले की यात्रा के लिए सबसे उपयुक्त है। इस दौरान मौसम ठंडा और सुहावना होता है। मानसून के बाद घाटी हरी-भरी हो जाती है।
बारिश के मौसम में झरने बहने लगते हैं, लेकिन रास्ते फिसलन भरे हो सकते हैं, इसलिए ट्रैकर्स को सावधानी बरतनी चाहिए।
गर्मी के महीनों में सुबह जल्दी या शाम को यात्रा करना बेहतर होता है, ताकि आप सूर्योदय और सूर्योस्त के अद्भुत दृश्यों का आनंद ले सकें।
लोहगढ़ तक पहुँचने का मार्ग
लोहगढ़ किला मुंबई से लगभग 100 किमी और पुणे से 60 किमी दूर है। आप मुंबई-पुणे एक्सप्रेसवे के माध्यम से लोनावला होते हुए बेस विलेज 'मलावली' तक पहुँच सकते हैं।
रेल मार्ग से आने के लिए नजदीकी रेलवे स्टेशन 'मलावली' है, जो किले से केवल 5 किमी दूर है। हवाई मार्ग से आने के लिए पुणे और मुंबई के हवाई अड्डे निकटतम हैं।
