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ग्रेजुएशन कैप उछालने की परंपरा का इतिहास और महत्व

ग्रेजुएशन कैप उछालने की परंपरा का इतिहास और महत्व जानें। यह परंपरा सदियों पुरानी शैक्षणिक परंपराओं से जुड़ी है और आज भी विश्वभर में लोकप्रिय है। जानें इसके पीछे की कहानी और कैसे यह एक वैश्विक प्रतीक बन गई है।
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दीक्षांत समारोह की खुशी का प्रतीक

नई दिल्ली: कॉलेज या विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में एक सामान्य दृश्य होता है, जब छात्र अपनी चौकोर टोपी को खुशी से हवा में उछालते हैं। यह परंपरा वर्षों से चली आ रही है, लेकिन इसके पीछे का इतिहास बहुत कम लोग जानते हैं। ग्रेजुएशन कैप, गाउन और हुड केवल औपचारिक वस्त्र नहीं हैं, बल्कि ये सदियों पुरानी शैक्षणिक परंपराओं से जुड़े हुए हैं। टोपी को हवा में उछालने की परंपरा एक विशेष ऐतिहासिक घटना से शुरू हुई, जिसने बाद में वैश्विक रूप ले लिया।


गाउन पहनने की परंपरा का उदय

सदियों पहले शुरू हुई गाउन पहनने की परंपरा

विशेषज्ञों के अनुसार, दीक्षांत समारोह में गाउन पहनने की परंपरा 12वीं और 13वीं शताब्दी के यूरोप से शुरू हुई। उस समय बोलोग्ना, पेरिस और ऑक्सफोर्ड जैसे विश्वविद्यालय उच्च शिक्षा के प्रमुख केंद्र थे। विश्वविद्यालयों की इमारतें बेहद ठंडी होती थीं और गर्म रखने के लिए पर्याप्त व्यवस्था नहीं होती थी। इसलिए छात्र और शिक्षक लंबी पोशाक पहनकर खुद को ठंड से बचाते थे।


शिक्षा का प्रतीक बनता गाउन

धीरे-धीरे शिक्षा का प्रतीक

उस समय कई विद्वान चर्च से जुड़े थे, इसलिए उनकी वेशभूषा धार्मिक अधिकारियों के गाउन से मिलती जुलती थी। समय के साथ, यह पोशाक केवल आवश्यकता नहीं रही, बल्कि शैक्षणिक सम्मान का प्रतीक बन गई। बाद में, यूरोप के विश्वविद्यालयों ने दीक्षांत समारोह में गाउन, हुड और कैप पहनना अनिवार्य कर दिया। यही परंपरा आगे चलकर अन्य देशों में भी फैल गई।


हुड और लटकन का महत्व

हुड और लटकन का भी है खास महत्व

दीक्षांत समारोह में गाउन के साथ पहना जाने वाला हुड छात्र की शैक्षणिक योग्यता और विषय की पहचान का प्रतीक होता है। इसके रंग और डिजाइन से बैचलर्स, मास्टर्स या पीएचडी जैसी डिग्रियों का पता चलता है। समारोह की शुरुआत में कैप पर लगी लटकन एक तरफ रहती है और डिग्री मिलने के बाद उसे दूसरी तरफ घुमाया जाता है, जो पढ़ाई पूरी होने का प्रतीक है।


टोपी उछालने की परंपरा का आरंभ

1912 में शुरू हुई टोपी उछालने की परंपरा

इतिहासकारों के अनुसार, ग्रेजुएशन कैप को हवा में उछालने की परंपरा 1912 में यूनाइटेड स्टेट्स नेवल एकेडमी से शुरू हुई। उस वर्ष पढ़ाई पूरी करने वाले कैडेटों को नई आधिकारिक टोपियां दी गईं। पुरानी टोपियों की आवश्यकता खत्म होने पर उन्होंने खुशी में उन्हें हवा में उछाल दिया। यही दृश्य बाद में अन्य कॉलेजों और विश्वविद्यालयों ने भी अपनाया।


वैश्विक प्रतीक बन चुकी परंपरा

आज सफलता का वैश्विक प्रतीक बन चुकी है परंपरा

समय के साथ, कई देशों ने अपनी सांस्कृतिक परंपराओं के अनुसार दीक्षांत समारोह की पोशाक में बदलाव किए हैं। इसके बावजूद, ग्रेजुएशन कैप, गाउन और टोपी उछालने की परंपरा आज भी विश्वभर में लोकप्रिय है। हालांकि कुछ संस्थान टोपियां खोने या खराब होने की आशंका के चलते इसे प्रोत्साहित नहीं करते, लेकिन अधिकांश स्थानों पर यह उपलब्धि और नए सफर की शुरुआत का प्रतीक माना जाता है।