द्विती चंद्र साहू: संघर्ष से सफलता की कहानी
प्रेरणादायक यात्रा
प्रेरणादायक यात्रा: ओडिशा के रायगड़ा जिले के कोटापेटा गांव के द्विती चंद्र साहू ने कठिनाइयों का सामना करते हुए शिक्षा की ओर कदम बढ़ाया। उनके परिवार की आर्थिक स्थिति बहुत खराब थी, और पिता के निधन के बाद उनकी मां ने बेटे की पढ़ाई के लिए दूसरों के घरों में काम किया।
भूख के बावजूद पढ़ाई का जज्बा
द्विती चंद्र साहू का बचपन आर्थिक तंगी में बीता। कई बार उन्हें भूखे रहकर रात बितानी पड़ी, लेकिन पढ़ाई के प्रति उनका जज्बा कभी कमजोर नहीं हुआ। उनकी मां ने परिवार की जिम्मेदारी संभाली और बेटे को पढ़ाने के लिए हर संभव प्रयास किया।
अखबार बेचकर पढ़ाई का खर्च उठाया
साहू ने ओडिशा के एक दुर्गम क्षेत्र में पढ़ाई की, जहां बुनियादी सुविधाओं की कमी थी। उन्होंने मैट्रिक की परीक्षा पास की, लेकिन आगे की पढ़ाई के लिए पैसे जुटाना चुनौतीपूर्ण था। इसके लिए उन्होंने रोजाना पैदल चलकर अखबार बेचे और इसी से अपनी शिक्षा का खर्च उठाया।
पत्रकारिता से शिक्षक बनने का सफर
साहू ने शिक्षा का रास्ता नहीं छोड़ा और जनजातीय अध्ययन में पीएचडी की। 1997 से 2001 तक उन्होंने पत्रकारिता की पढ़ाई की और फिर सरकारी ट्रेनिंग पूरी करके शिक्षक बने। रायगढ़ के सरकारी स्कूल में उन्होंने बच्चों को पढ़ाने के नए तरीके अपनाए।
सीमित संसाधनों में भी शिक्षा का मार्ग खोजा
दुर्गम इलाके में बिजली और इंटरनेट की सीमित सुविधाओं के बावजूद, साहू ने ICT का उपयोग किया। उन्होंने कनेक्टिविटी वाले क्षेत्रों में जाकर शैक्षणिक वीडियो डाउनलोड किए और उन्हें अपने छात्रों को पढ़ाने में इस्तेमाल किया।
पत्रकारिता के अनुभव का शिक्षण में उपयोग
साहू ने पत्रकारिता से मिले अनुभव को शिक्षण में शामिल किया। उन्होंने विभिन्न गतिविधियों को पढ़ाई से जोड़ा और बाइलिंगुअल शिक्षा को बढ़ावा दिया। गणित को समझाने के लिए उन्होंने कंचों और फ्लैशकार्ड का उपयोग किया।
बच्चों के लिए अनोखा सीखने का माहौल
द्विती साहू ने 'परिमाल पाठशाला' की स्थापना की, जिसमें साफ-सफाई और सुरक्षा पर ध्यान दिया गया। उन्होंने 'पिटारा शिक्षण पेटी' भी शुरू की, जिसमें रीसाइकल की गई चीजों से शैक्षणिक उपकरण बनाए जाते हैं। उनके योगदान को राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता मिली और राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने उन्हें 'नेशनल अवॉर्ड फॉर टीचर्स 2024' से सम्मानित किया।
