चावल की खेती और ग्लोबल वार्मिंग: एक गंभीर समस्या
चावल की थाली और पर्यावरण पर प्रभाव
भारत में दाल-चावल या बिरयानी का सेवन आम है, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि ये चावल ग्लोबल वार्मिंग में योगदान दे रहे हैं? आईआईएसईआर भोपाल और इंटरनेशनल राइस रिसर्च इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिकों द्वारा की गई एक नई अध्ययन ने इस तथ्य को उजागर किया है।
ग्लोबल वार्मिंग में योगदान
इस अध्ययन के अनुसार, भारत के धान के खेत हर साल लगभग 9.7 मिलियन टन मीथेन गैस का उत्सर्जन करते हैं, जो पहले के अनुमानों से कहीं अधिक है। मीथेन, कार्बन डाइऑक्साइड के बाद, ग्लोबल वार्मिंग का दूसरा सबसे बड़ा कारण है, और औद्योगिक क्रांति के बाद कुल ग्लोबल वार्मिंग में इसकी हिस्सेदारी लगभग 30 प्रतिशत है। यह शोध 'एनवायर्नमेंटल रिसर्च लेटर्स' में प्रकाशित हुआ है।
धान की खेती का गणित
भारत में लगभग चार करोड़ हेक्टेयर भूमि पर धान की खेती होती है, जहां लंबे समय तक पानी भरा रहता है। इससे मिट्टी में ऑक्सीजन की कमी होती है, और ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में बैक्टीरिया फसल के अवशेषों को सड़ाकर मीथेन गैस का निर्माण करते हैं। यह प्रक्रिया पुरानी है, लेकिन जलवायु परिवर्तन के कारण यह एक गंभीर समस्या बन गई है।
भविष्य की चुनौतियाँ और समाधान
वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि यदि तापमान बढ़ता रहा और बारिश का पैटर्न बिगड़ता गया, तो सदी के मध्य तक मीथेन उत्सर्जन 25 प्रतिशत तक बढ़ सकता है। हालांकि, एक समाधान भी है। खेतों से पानी निकालकर 'बारी-बारी से गीला और सूखा' करने की तकनीक अपनाने से मीथेन उत्सर्जन 30 से 50 प्रतिशत तक कम किया जा सकता है। लेकिन, यह तकनीक अभी बहुत कम किसानों द्वारा अपनाई जा रही है।
छोटे किसानों के पास सिंचाई के नियंत्रण और निगरानी के साधन नहीं हैं, और मौसम की अनिश्चितता के कारण वे फसल के नुकसान के डर से पानी नहीं निकालते। कुछ क्षेत्रों में खेतों के पानी से मछली पालन भी किया जाता है, जिससे उत्सर्जन कम नहीं होता।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि किसानों को उचित प्रशिक्षण, सब्सिडी और तकनीक उपलब्ध कराई जाए, तो इस समस्या को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है। चावल हमारी आवश्यकताओं का हिस्सा है, लेकिन इसे पर्यावरण की कीमत पर नहीं होना चाहिए।
