दशहरा पर जलेबी और पान: जानें क्यों हैं ये परंपराएं खास
दशहरा: बुराई पर अच्छाई की जीत का पर्व
नई दिल्ली: दशहरा, जिसे विजयादशमी के नाम से भी जाना जाता है, भारत के प्रमुख त्योहारों में से एक है। यह पर्व अधर्म पर धर्म और बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है। रामायण के अनुसार, इस दिन भगवान श्रीराम ने लंकापति रावण का वध कर माता सीता को मुक्त किया था। इसी विजय की स्मृति में हर साल दशहरा मनाया जाता है। इस दिन देशभर में रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतले जलाने की परंपरा है, लेकिन इसके साथ ही कई अनोखी परंपराएं भी हैं जो विभिन्न राज्यों में मनाई जाती हैं।
रावण दहन के बाद जलेबी खाने की परंपरा
दशहरे के मेले में यह देखा जाता है कि लोग रावण दहन के बाद जलेबी का आनंद लेते हैं। उत्तर भारत में इसे शुभ माना जाता है। मान्यता है कि भगवान श्रीराम को शश्कुली नाम की मिठाई बहुत पसंद थी, जो आज की जलेबी के समान है। रावण पर विजय के बाद इसी मिठाई को बांटकर खुशी मनाई गई थी, और तभी से यह परंपरा चली आ रही है। इसके अलावा, जलेबी की मिठास और गोल आकार जीवन में सुख, समृद्धि और विजय का प्रतीक माने जाते हैं।
पान खिलाने की परंपरा
दशहरे पर कई स्थानों पर लोग एक-दूसरे को पान खिलाकर बधाई देते हैं। हिंदू धर्म में पान के पत्ते को पवित्र और शुभ माना जाता है। हर पूजा-पाठ और धार्मिक कार्य में पान का उपयोग होता है। विजयादशमी के दिन पान का पत्ता मंगलकारी माना जाता है। इसे खिलाना प्रेम, सम्मान और भाईचारे का प्रतीक है, हालांकि हर राज्य में इसके पीछे की मान्यता थोड़ी भिन्न होती है।
शमी के पत्तों का महत्व
महाराष्ट्र सहित कई राज्यों में दशहरे पर शमी के पत्ते बांटने की परंपरा है। इन पत्तों को सोने के प्रतीक के रूप में एक-दूसरे को दिया जाता है। लोग एक-दूसरे को शमी के पत्ते देकर सुख, सौभाग्य और तरक्की की कामना करते हैं। यह परंपरा प्रियजनों के जीवन में खुशहाली और सफलता की प्रार्थना का संदेश देती है।
टीका और शस्त्र पूजा का महत्व
दशहरे पर टीका लगाने की परंपरा भी महत्वपूर्ण है, जो नेपाल में अधिक प्रचलित है। घर के बड़े बुजुर्ग छोटे बच्चों के माथे पर दही, चावल और सिंदूर का टीका लगाकर लंबी उम्र और सफलता का आशीर्वाद देते हैं। इसके अलावा, दक्षिण भारत में इस दिन शस्त्र पूजा की जाती है। लोग अपने औजारों, किताबों, मशीनों और हथियारों की पूजा कर अपने कर्तव्य और ज्ञान का सम्मान करते हैं।
