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किसानों के लिए नई आय का स्रोत: कार्बन क्रेडिट योजना

किसानों के लिए एक नई आय का स्रोत बनने वाली कार्बन क्रेडिट योजना अब लागू हो चुकी है। इस योजना के तहत किसान अपने खेतों से उत्पन्न कार्बन क्रेडिट के लिए भुगतान प्राप्त कर सकते हैं। पंजाब और हरियाणा में शुरू की गई इस योजना के तहत किसानों को डिजिटल भुगतान किया जा रहा है। जानें इस योजना के लाभ, भुगतान प्रक्रिया और कैसे किसान इसका लाभ उठा सकते हैं।
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किसानों की नई कमाई के अवसर

यदि आप एक किसान हैं, तो अब आपकी आय केवल फसल उत्पादन पर निर्भर नहीं करेगी। सरकार अब ऐसी कृषि तकनीकों को अपनाने पर जोर दे रही है, जो मिट्टी में कार्बन की मात्रा बढ़ाने, जल संरक्षण और ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को कम करने में मदद करती हैं। पंजाब और हरियाणा में, किसानों को उनके खेतों से उत्पन्न मृदा-कार्बन क्रेडिट के लिए सीधे भुगतान मिलना शुरू हो गया है, और भविष्य में और अधिक किसानों को इस योजना में शामिल किया जा सकता है.


डिजिटल भुगतान की शुरुआत

14 सितंबर 2026 को पंजाब एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी लुधियाना में आयोजित एक कार्यक्रम में 2,550 किसानों के लिए डिजिटल भुगतान की प्रक्रिया शुरू की गई। केंद्र सरकार के कृषि मंत्रालय के अनुसार, इस चरण में 2.9 करोड़ रुपये से अधिक की राशि वितरित की जाएगी। यह भुगतान ग्रो इंडिगो के 'आदि किसान कार्बन कार्यक्रम' के तहत किया जा रहा है.


भुगतान की प्रक्रिया

इस योजना की एक विशेषता यह है कि सभी किसानों को समान राशि नहीं मिलती। भुगतान किसान के खेत से उत्पन्न कार्बन क्रेडिट की मात्रा और उसके हिस्से के आधार पर निर्धारित होता है। ग्रो इंडिगो के अनुसार, पहले भुगतान में औसत राशि 11,478 रुपये, न्यूनतम 3,000 रुपये और अधिकतम 1,17,985 रुपये रही। हालांकि, अधिकांश किसानों को 4,000 से 15,000 रुपये के बीच राशि प्राप्त हुई है.


योजना का उद्देश्य

सरकार ऐसे कृषि तरीकों को अपनाने पर जोर दे रही है, जो वातावरण में ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को कम करते हैं और मिट्टी में कार्बन को लंबे समय तक बनाए रखते हैं। वैज्ञानिक तरीके से यह निर्धारित किया जाता है कि किसान के खेत में कार्बन में कमी या वृद्धि से कितना लाभ हुआ है। इसके बाद स्वतंत्र एजेंसी द्वारा आंकड़ों की जांच की जाती है। यदि सब कुछ सही पाया जाता है, तो किसान को कार्बन क्रेडिट जारी किए जाते हैं.


पराली जलाने की समस्या का समाधान

देश में बढ़ते प्रदूषण का एक प्रमुख कारण पराली जलाना है। यदि किसान पराली का प्रबंधन खेत में ही करते हैं, तो इससे धुएं और वायु प्रदूषण में कमी आती है। पराली को मिट्टी में मिलाने से मिट्टी की सेहत में सुधार होता है और कार्बन भी मिट्टी में बना रहता है. इस कारण से इस प्रकार की खेती को कार्बन क्रेडिट से जोड़ा जा रहा है. 2019 से 2022 के बीच इस कार्यक्रम से जुड़े खेतों में लगभग 45 अरब लीटर पानी की बचत हुई और 2 लाख टन से अधिक पराली जलने से बची है.


लाभ कैसे उठाएं?

  • किसान को सबसे पहले कार्बन क्रेडिट कार्यक्रम में रजिस्ट्रेशन कराना होगा। इसके बाद उसका खेत इस योजना से जुड़ जाएगा।
  • किसान को ऐसी खेती की तकनीक अपनानी होगी, जिससे कार्बन उत्सर्जन और प्रदूषण कम हो। इसमें DSR, कम जुताई और पराली न जलाना जैसी पद्धतियां शामिल हैं।
  • किसान को अपने खेत और खेती का रिकॉर्ड रखना होगा। इसमें खेत का क्षेत्रफल, फसल और अपनाई गई खेती की तकनीक जैसी जानकारी शामिल होगी।
  • किसान के खेत की निगरानी और जांच की जाएगी। इसके लिए खेत का डेटा, मिट्टी के नमूने और सैटेलाइट तस्वीरों जैसी तकनीकों का इस्तेमाल किया जा सकता है। जांच के बाद ही कार्बन क्रेडिट जारी होंगे।
  • कार्बन क्रेडिट की बिक्री से मिलने वाली रकम में किसान को हिस्सा मिलेगा।