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जस्टिस वर्मा के कैश कांड की जांच रिपोर्ट संसद में पेश

जस्टिस यशवंत वर्मा से जुड़े कैश कांड की जांच रिपोर्ट बुधवार को संसद में पेश की गई। इस रिपोर्ट में अधजली नोटों की गड्डियों की खोज और महाभियोग प्रक्रिया का विवरण शामिल है। जानें इस मामले की जटिलताएं और जस्टिस वर्मा के इस्तीफे के बाद की स्थिति।
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जांच रिपोर्ट का संसद में प्रस्तुतिकरण

बुधवार को जस्टिस यशवंत वर्मा से जुड़े कथित कैश कांड की जांच रिपोर्ट को संसद के दोनों सदनों में पेश किया गया। राज्यसभा में महासचिव पीसी मोदी और लोकसभा में महासचिव उत्वल कुमार सिंह ने इस रिपोर्ट को सदन के समक्ष रखा। रिपोर्ट के साथ जांच के दौरान एकत्र किए गए मौखिक और दस्तावेजी सबूत भी शामिल किए गए।


कैश कांड का प्रारंभिक मामला

यह मामला तब सामने आया जब 14 मार्च 2025 को जस्टिस वर्मा के सरकारी आवास में आग लगी, जिसके बाद अधजली नोटों की गड्डियां मिलीं। उस समय वे दिल्ली हाई कोर्ट के जज थे। जांच शुरू होने के बाद उन्हें इलाहाबाद हाई कोर्ट में स्थानांतरित कर दिया गया, और बाद में उन्होंने वहां से इस्तीफा दे दिया, जिससे संसद में उनके खिलाफ चल रही महाभियोग प्रक्रिया समाप्त हो गई।


अधजली नकदी की खोज

जस्टिस वर्मा के सरकारी आवास में आग लगने के बाद दमकलकर्मियों ने एक स्टोर रूम में अधजली नोटों की गड्डियां पाई थीं। इस घटना के बाद तत्कालीन चीफ जस्टिस संजीव खन्ना ने एक आंतरिक समिति का गठन किया। समिति ने पाया कि जिस स्टोर रूम में नकदी मिली थी, उस पर जस्टिस वर्मा का नियंत्रण था।


महाभियोग प्रस्ताव पर सांसदों की प्रतिक्रिया

जुलाई 2025 में, 200 से अधिक सांसदों ने जस्टिस वर्मा को पद से हटाने के लिए महाभियोग प्रस्ताव पर हस्ताक्षर किए। इसके बाद लोकसभा स्पीकर ओम बिरला ने अगस्त 2025 में एक तीन सदस्यीय जांच समिति का गठन किया। समिति ने मामले से संबंधित दस्तावेजों और गवाहों के बयानों की जांच की और मई 2026 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की। अब यह रिपोर्ट संसद में पेश की गई है।


इस्तीफे के बाद की स्थिति

जस्टिस वर्मा ने महाभियोग प्रक्रिया के पूरा होने से पहले ही इलाहाबाद हाई कोर्ट के जज पद से इस्तीफा दे दिया था। इस स्थिति में महाभियोग के जरिए उन्हें हटाने की प्रक्रिया का कोई व्यावहारिक प्रभाव नहीं रह गया है। विशेषज्ञों के अनुसार, यदि कोई जज राष्ट्रपति को अपना इस्तीफा भेजता है और इसकी कॉपी सार्वजनिक हो जाती है, तो इसे प्रभावी माना जाता है। हालांकि, राष्ट्रपति की औपचारिक स्वीकृति और कानून मंत्रालय द्वारा अधिसूचना जारी करना आवश्यक है। वर्तमान में, जस्टिस वर्मा के इस्तीफे की अधिसूचना जारी नहीं हुई है।