फास्ट ट्रैक अदालतों की वास्तविकता: त्वरित न्याय की चुनौती
प्रधानमंत्री का फास्ट ट्रैक कोर्ट का प्रस्ताव
NEET परीक्षा के पेपर लीक के खिलाफ हुए प्रदर्शनों के बाद, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने घोषणा की कि ऐसे मामलों के लिए फास्ट ट्रैक अदालतें स्थापित की जाएंगी। इन अदालतों का उद्देश्य है कि वे मामलों को तेजी से निपटाएं। हालांकि, इनमें 'तारीख पर तारीख' की प्रक्रिया होती है, लेकिन दो तारीखों के बीच का समय बहुत कम होता है। इसके बावजूद, ये अदालतें त्वरित न्याय की गारंटी नहीं देतीं। केंद्र सरकार के आंकड़ों के अनुसार, साल भर में फास्ट ट्रैक अदालतों में आने वाले मामलों में से केवल एक तिहाई में ही निर्णय हो पाता है। नतीजतन, त्वरित न्याय की उम्मीद में भेजे गए हजारों मामले लंबित रह जाते हैं, जिनमें एक साल से अधिक का समय लग सकता है।
चर्चित मामलों का विश्लेषण
कुछ प्रमुख मामलों पर नजर डालें तो यह स्पष्ट होता है कि जिन मामलों में व्यापक हंगामा हुआ, उन पर भी कई महीने या साल लग गए। उदाहरण के लिए, निर्भया केस में ट्रायल कोर्ट ने सजा सुनाने में कम समय लिया, लेकिन यह भी 9 महीने का था। दिलचस्प बात यह है कि फास्ट ट्रैक कोर्ट के निर्णय के बाद, मामले उच्च न्यायालय और सुप्रीम कोर्ट में कई सालों तक चलते हैं। निर्भया केस में अंतिम निर्णय आने में 7 साल का समय लगा।
फास्ट ट्रैक अदालतों की वास्तविकता
हाल ही में संसद में लोकसभा सांसदों ने फास्ट ट्रैक अदालतों की संख्या, उनमें चल रहे मामलों, समाप्त मामलों और उनके परिणामों की जानकारी मांगी। कानून मंत्रालय ने 24 जुलाई को इस पर लिखित उत्तर दिया। इस उत्तर में बताया गया कि अक्टूबर 2019 में फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट (FTSC) की स्थापना की गई, जिसमें विशेष रूप से पॉक्सो अदालतें शामिल हैं। इसका उद्देश्य नाबालिगों के खिलाफ यौन उत्पीड़न के मामलों का शीघ्र निपटारा करना है।
पेंडिंग मामलों की संख्या
30 अप्रैल 2026 तक के आंकड़ों के अनुसार, देश में कुल 775 फास्ट ट्रैक अदालतें हैं, जिनमें से 398 अदालतें केवल पॉक्सो मामलों के लिए हैं। झारखंड एकमात्र ऐसा राज्य है जहां कोई फास्ट ट्रैक अदालत नहीं है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 2023 में 81,471 मामले दर्ज किए गए, जिनमें से 76,319 मामले समाप्त हुए, जबकि 5,152 मामले लंबित रह गए। इसी तरह, 2024 में 85,595 मामले समाप्त हुए और 3,307 मामले लंबित रहे।
फास्ट ट्रैक अदालतों पर खर्च
FTSC योजना के तहत, राज्य और केंद्र दोनों सरकारें खर्च करती हैं। प्रत्येक अदालत में एक न्यायिक अधिकारी और 7 सहायक कर्मचारी होते हैं। कानून मंत्रालय के अनुसार, अब तक कुल 1259.51 करोड़ रुपये राज्यों को दिए जा चुके हैं। पिछले तीन वर्षों में हर साल 200 करोड़ रुपये केंद्र सरकार द्वारा जारी किए जा रहे हैं। उत्तर प्रदेश को सबसे अधिक धन मिला है, जबकि आंध्र प्रदेश को पिछले तीन वर्षों में एक भी पैसा नहीं मिला है।
