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भारत में गे जज की नियुक्ति पर विवाद: सौरभ कृपाल का मामला

भारत में गे जज की नियुक्ति पर विवाद गहराता जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज संजय किशन कौल ने सौरभ कृपाल की जज बनने की प्रक्रिया में रुकावटों का खुलासा किया है। उन्होंने बताया कि भारतीय समाज अभी तक लैंगिक पहचान को लेकर पूरी तरह से तैयार नहीं है। सौरभ कृपाल, जो एक प्रमुख वकील और LGBTQ अधिकारों के लिए सक्रिय हैं, की नियुक्ति कई बार सिफारिशों के बावजूद रुकी हुई है। जानें इस मुद्दे के पीछे की जटिलताएं और सौरभ की पहचान के बारे में।
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भारत में गे जज की स्वीकृति पर सवाल

भारत में गे जज को स्वीकार करने की स्थिति अभी तक स्पष्ट नहीं है। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज संजय किशन कौल ने बताया कि जब एडवोकेट सौरभ कृपाल का नाम जज के रूप में पदोन्नति के लिए आया, तो न तो सरकार और न ही कॉलेजियम ने इसे स्वीकार किया। इसके पीछे का कारण यह है कि भारतीय समाज अभी तक लैंगिक पहचान को लेकर पूरी तरह से तैयार नहीं है। सौरभ कृपाल अपनी समलैंगिक पहचान को लेकर खुलकर बात करते हैं।


सौरभ कृपाल की जज बनने की प्रक्रिया में रुकावट

स्मिता प्रकाश ने जस्टिस संजय किशन कौल से पूछा कि सौरभ कृपाल को दिल्ली हाई कोर्ट का जज क्यों नहीं बनाया गया। उन्होंने कहा कि असली कारण यह है कि देश अभी एक गे जज को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है। कौल ने यह भी बताया कि कॉलेजियम में सहमति बनाने में समय लगा, लेकिन जब वह कॉलेजियम का हिस्सा थे, तो उन्हें इस नाम को आगे बढ़ाने में कोई समस्या नहीं थी।


सौरभ कृपाल की पहचान और करियर

एडवोकेट सौरभ कृपाल एक प्रमुख वकील हैं, जो अपनी लैंगिक पहचान को लेकर मुखर हैं। उन्होंने अपनी नियुक्ति में देरी पर नाराजगी जताई थी। सौरभ ने कई किताबें लिखी हैं और वे दिल्ली हाई कोर्ट में सीनियर एडवोकेट हैं। वे LGBTQ अधिकारों के लिए भी सक्रिय हैं। उनका जन्म 18 अप्रैल 1972 को हुआ था और उनके पिता बी एन कृपाल भी सुप्रीम कोर्ट के जज रह चुके हैं।


सौरभ कृपाल का शैक्षणिक और व्यक्तिगत जीवन

सौरभ ने दिल्ली के सेंट स्टीफंस कॉलेज से फिजिक्स में ग्रेजुएशन किया और फिर ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी से लॉ की पढ़ाई की। वे पिछले 20 वर्षों से अपने पार्टनर निकोलस जर्मेन बाकमैन के साथ रह रहे हैं। सौरभ स्विट्जरलैंड के नागरिक हैं और दिल्ली में स्विस दूतावास में कार्यरत हैं।


सौरभ कृपाल का कानूनी करियर

सौरभ ने संयुक्त राष्ट्र में भी काम किया है और सुप्रीम कोर्ट तथा दिल्ली हाई कोर्ट में 20 साल से अधिक समय से प्रैक्टिस कर रहे हैं। उन्होंने नवतेज सिंह जौहर केस में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी, जिसके परिणामस्वरूप धारा 377 को हटाया गया। वे नाज फाउंडेशन के बोर्ड मेंबर भी हैं और 2021 में उन्हें सीनियर एडवोकेट का दर्जा दिया गया।


सौरभ कृपाल की नियुक्ति में अड़चनें

सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने सौरभ कृपाल की नियुक्ति के लिए कई बार सिफारिश की, लेकिन मंत्रालय ने उनकी यौनिकता और विदेशी पार्टनर को आधार बनाकर देरी की। कॉलेजियम ने कहा कि उनकी मुखरता और विविधता के लिए आवश्यक है, लेकिन सरकार का समलैंगिकता पर दृष्टिकोण अस्पष्ट रहा है।


सरकार की आपत्तियों पर सुप्रीम कोर्ट का रुख

सरकार की आपत्तियों पर जजों ने कहा कि साथी के विदेशी नागरिक होने से राष्ट्रीय सुरक्षा को कोई खतरा नहीं है। कॉलेजियम ने सौरभ को योग्य और बुद्धिमान बताया और कहा कि उनकी नियुक्ति से दिल्ली हाई कोर्ट में विविधता बढ़ेगी।