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Skyroot Aerospace का विक्रम-1: भारत का पहला निजी ऑर्बिटल रॉकेट लॉन्च के लिए तैयार

भारत का अंतरिक्ष क्षेत्र आज एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर पार करने जा रहा है। स्काईरूट एयरोस्पेस का विक्रम-1 रॉकेट आज लॉन्च होने वाला है, जो भारत की पहली निजी कंपनी द्वारा विकसित किया गया है। इस मिशन का उद्देश्य 450 किलोमीटर ऊँचाई पर तकनीकी पेलोड स्थापित करना है। यदि यह सफल होता है, तो भारत का निजी अंतरिक्ष उद्योग वैश्विक मंच पर नई पहचान बना सकेगा। जानें इस रॉकेट की विशेषताएँ और इसके महत्व के बारे में।
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भारत का अंतरिक्ष क्षेत्र एक नई दिशा में


नई दिल्ली: भारत का अंतरिक्ष उद्योग आज एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर पार करने जा रहा है। हैदराबाद की निजी कंपनी स्काईरूट एयरोस्पेस का पहला ऑर्बिटल रॉकेट विक्रम-1 आज सुबह 11:30 बजे श्रीहरिकोटा के सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र (SDSC-SHAR) से लॉन्च किया जाएगा।


इस अभियान को 'मिशन आगमन' नाम दिया गया है, जो भारत की निजी अंतरिक्ष कंपनियों के लिए एक महत्वपूर्ण अवसर है। यदि यह मिशन सफल होता है, तो भारत वैश्विक निजी लॉन्च बाजार में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज करवा सकेगा।


विक्रम-1: भारत के निजी स्पेस सेक्टर का नया अध्याय

विक्रम-1 भारत की पहली निजी कंपनी द्वारा डिजाइन और विकसित किया गया ऑर्बिटल लॉन्च व्हीकल है। लॉन्च से पहले सभी तकनीकी परीक्षण, टेलीमेट्री और ट्रैकिंग सिस्टम की जांच पूरी कर ली गई है। स्काईरूट के सह-संस्थापक और सीईओ पवन कुमार चंदाना ने बताया कि सभी आवश्यक परीक्षण सफलतापूर्वक संपन्न हो चुके हैं और अब असली चुनौती उड़ान के दौरान होगी।


विक्रम-1 की विशेषताएँ

विक्रम-1 लगभग सात मंजिल ऊंचा एक अत्याधुनिक लॉन्च व्हीकल है, जिसे पूरी तरह से कार्बन कॉम्पोजिट से बनाया गया है। इसमें 3डी-प्रिंटेड इंजन और शक्तिशाली सॉलिड रॉकेट मोटर का उपयोग किया गया है। यह रॉकेट लगभग 350 किलोग्राम तक का पेलोड ले जाने की क्षमता रखता है।




भारत की नई उड़ान: वैश्विक बाजार में प्रवेश

इस मिशन के दौरान विक्रम-1 कई तकनीकी पेलोड को 450 किलोमीटर ऊंची लो अर्थ ऑर्बिट (LEO) में स्थापित करने का प्रयास करेगा। इसके साथ ही कुछ प्रतीकात्मक संदेश भी भेजे जाएंगे, जिनमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का हस्तलिखित 'वंदे मातरम्' संदेश शामिल है।


स्काईरूट ने पहले 2022 में विक्रम-एस सबऑर्बिटल मिशन सफलतापूर्वक पूरा किया था। विक्रम-1 की सफलता कंपनी के लिए नियमित व्यावसायिक लॉन्च की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकती है।


दुनियाभर में छोटे उपग्रहों के प्रक्षेपण की मांग तेजी से बढ़ रही है। यदि यह मिशन सफल होता है, तो भारत का निजी अंतरिक्ष उद्योग वैश्विक मंच पर नई पहचान बनाएगा। यह इस बात का भी प्रमाण होगा कि भविष्य में इसरो और निजी कंपनियाँ मिलकर भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम को नई ऊँचाइयों तक पहुँचा सकती हैं।