बेलेघाटा की काली दुर्गा का अद्भुत इतिहास, तीन सौ साल पुरानी है परंपरा
कोलकाता, 21 सितंबर (हि.स.)।
देश के सबसे बड़े त्योहारों में शामिल दुर्गापूजा के साथ मां दुर्गा को लेकर देशभर में अनेक कथाएं और परंपराएं जुड़ी हुई हैं। आमतौर पर बंगाल में मां दुर्गा की प्रतिमा का वर्ण तप्त कांचन जैसा यानी सुनहरे या गौर रंग का देखा जाता है। लेकिन कोलकाता के बेलेघाटा में भट्टाचार्य परिवार की दुर्गापूजा इस परंपरा से अलग और बेहद अनोखी है। यहां मां दुर्गा की पूजा ‘भद्रकाली’ रूप में की जाती है और उनकी प्रतिमा का रंग घोर कृष्णवर्ण है। वहीं देवी के चारों संतानों का रंग गौर है।
इस प्रतिमा में महिषासुर का रंग उभरती हुई पत्तियों की तरह हरा रखा जाता है। कालिका पुराण की परंपरा के अनुसार आयोजित होने वाली इस पूजा को देखने के लिए हर वर्ष बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं।
करीब 300 वर्ष पहले अविभाजित बंगाल के पाबना जिले के स्थलवसंतपुर में इस पूजा की शुरुआत हुई थी। नदिया निवासी हरिदेव भट्टाचार्य को नाटोर की रानी भवानी से जमीन प्राप्त हुई थी, जिसके बाद उन्होंने वहां जमींदारी स्थापित की। बताया जाता है कि उस समय परिवार में काली पूजा की परंपरा थी, लेकिन हरिदेव भट्टाचार्य को स्वप्न में मां दुर्गा को भद्रकाली के कृष्णवर्ण रूप में स्थापित करने का आदेश मिला। इसी कथित स्वप्नादेश के बाद परिवार में मां दुर्गा की इस अनोखी पूजा की शुरुआत हुई, जो आज भी जारी है।
भट्टाचार्य परिवार की दुर्गा प्रतिमा में देवी-देवताओं की व्यवस्था भी अपने आप में खास है। देवी के दाहिनी ओर मां लक्ष्मी और भगवान कार्तिक विराजमान होते हैं, जबकि बाईं ओर मां सरस्वती और भगवान गणेश का स्थान होता है। शक्ति की यह विशेष व्यवस्था इस पूजा को बंगाल की अन्य पारंपरिक पारिवारिक दुर्गापूजाओं से अलग पहचान देती है।
देश के विभाजन के कारण इस ऐतिहासिक पूजा को कई बार अपना स्थान बदलना पड़ा। वर्ष 1935 में परिवार के सदस्य रोजगार के सिलसिले में आसनसोल और कोलकाता आ गए। इसके बाद वर्ष 1970 तक आसनसोल में दुर्गापूजा आयोजित होती रही। सत्तर के दशक में पूजा दुर्गापुर में होने लगी। इसके बाद अस्सी के दशक से भट्टाचार्य परिवार की यह ऐतिहासिक पूजा कोलकाता के बेलेघाटा में धीरेंद्र चारु स्मृति संघ के पास स्थायी रूप से आयोजित होने लगी।
आज भी बेलेघाटा की यह ‘काली दुर्गा’ अपनी अनोखी प्रतिमा, भद्रकाली स्वरूप और करीब तीन शताब्दियों पुरानी परंपरा के कारण श्रद्धालुओं के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र बनी हुई है। सामान्य रूप से देखी जाने वाली दुर्गा प्रतिमाओं से अलग मां का कृष्णवर्ण रूप इस पूजा को धार्मिक आस्था के साथ-साथ बंगाल की समृद्ध लोक और पारिवारिक परंपरा का भी एक महत्वपूर्ण हिस्सा बनाता है।
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हिन्दुस्थान समाचार / संतोष विश्वकर्मा
