भाजपा में संगठनात्मक बड़ा फेरबदल: 28 राज्यों और 8 केंद्रशासित प्रदेशों के लिए नए प्रभारी, 2027 के चुनावों से पहले संगठन को नई दिशा
नई दिल्ली, 23 सितंबर (हि.स.)। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने बुधवार को संगठन के स्तर पर बड़ा फेरबदल करते हुए 28 राज्यों और 8 केंद्रशासित प्रदेशों के लिए नए प्रदेश प्रभारी और सह-प्रभारियों की नियुक्ति कर दी। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन की ओर से घोषित इस सूची को महज पदों की अदला-बदली मानना शायद तस्वीर को छोटा करके देखने जैसा होगा। 2027 के विधानसभा चुनावों की आहट के बीच भाजपा ने राज्यों में अपनी संगठनात्मक मशीनरी को नए सिरे से सजाया है।
दिलचस्प बात यह है कि भाजपा ने इस बार सिर्फ प्रभारी बदलकर काम नहीं चलाया। कई बड़े राज्यों में प्रभारी के साथ दो, तीन और चार तक सह-प्रभारी लगाए गए हैं। यानी संगठन का संदेश साफ है। नई व्यवस्था में केंद्रीय नेतृत्व और प्रदेश इकाइयों के बीच समन्वय को ज्यादा मजबूत करने की कोशिश दिखाई देती है। खासकर उन राज्यों में जहां आने वाले समय में चुनावी गतिविधियां तेज होने वाली हैं, वहां जिम्मेदारियों का बड़ा नेटवर्क तैयार किया गया है।
महिलाओं का विशेष ध्यान रखते हुए बीजेपी के कुल 65 प्रभारी और सह प्रभारियों में 21 महिलाओं को भागीदारी देना पार्टी में महिला सशक्तिकरण के रूप में देखा जा सकता है। 4 प्रभारी और 16 सह प्रभारी के साथ भाजपा ने प्रभारियों की सूची में 32% भागीदारी महिलाओं को दी है।
सबसे ज्यादा चर्चा उत्तर प्रदेश को लेकर है। देश के सबसे बड़े राजनीतिक राज्य की जिम्मेदारी राष्ट्रीय महासचिव विनोद तावड़े को दी गई है। उनके साथ जगदीश पटेल, मेधा कुलकर्णी, प्रदीप वर्मा और आनंद ओझा को सह-प्रभारी बनाया गया है।
उत्तर प्रदेश में एक प्रभारी के साथ चार सह-प्रभारी लगाए जाने का मतलब संगठन के स्तर पर जिम्मेदारियों का व्यापक बंटवारा है। राज्य का आकार, राजनीतिक महत्व और 2027 के विधानसभा चुनावों की तैयारी इन तीनों को देखते हुए भाजपा यहां संगठनात्मक निगरानी को कई स्तरों पर चलाना चाहती है।
महाराष्ट्र में भाजपा राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बैजयंत जय पांडा को प्रभारी बनाया गया है। उनके साथ अमित मालवीय, सदानंद शेट तानावडे और कमलजीत सहरावत सह-प्रभारी होंगे।
दिल्ली की जिम्मेदारी डॉ विनय सहस्रबुद्धे को मिली है। उनके साथ जमयांग त्सेरिंग नामग्याल और दर्शना जरदोष सह-प्रभारी के तौर पर काम करेंगी। यानी जहां राज्य बड़ा या राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है, वहां भाजपा ने संगठन की 'वन-मैन आर्मी' के बजाय पूरी टीम उतारने का रास्ता चुना है।
नई सूची का एक और महत्वपूर्ण पहलू है। एक नेता, दो राज्यों की जिम्मेदारी। जी हाँ, स्मृति ईरानी को हरियाणा और छत्तीसगढ़, हरीश द्विवेदी को बिहार और कर्नाटक, राम माधव को तमिलनाडु और उत्तराखंड, सतीश पूनिया को पंजाब और जम्मू-कश्मीर तथा सुनील बंसल को तेलंगाना और पश्चिम बंगाल की जिम्मेदारी दी गई है।
यह मॉडल बताता है कि पार्टी कुछ नेताओं के अनुभव और संगठनात्मक क्षमता का इस्तेमाल एक से ज्यादा राज्यों में करना चाहती है। हालांकि दो राज्यों की जिम्मेदारी सुनने में जितनी प्रभावशाली लगती है, जमीन पर यह उतनी ही मेहनत भी मांगती है। अलग-अलग राजनीतिक संस्कृति, अलग संगठनात्मक समीकरण और अलग स्थानीय मुद्दों के बीच तालमेल बैठाना आसान हिसाब नहीं होगा।
कितना प्रभावी होगा दोहरी जिम्मेदारी
हरियाणा और छत्तीसगढ़ दोनों राज्य भाजपा शासित हैं। इसलिए यहां चुनौती केवल विपक्षी राजनीति का मुकाबला करने की नहीं होगी। पार्टी संगठन और सरकार के बीच तालमेल, कार्यकर्ताओं की सक्रियता और केंद्रीय नेतृत्व के संदेश को राज्य स्तर तक पहुंचाना भी महत्वपूर्ण होगा।
वहीं बिहार और कर्नाटक अलग जमीन एक प्रभारी, हरीश द्विवेदी को बिहार और कर्नाटक का प्रभारी बनाया गया है। बिहार में उनके साथ संगीता यादव और रोहन गुप्ता सह-प्रभारी होंगे। दोनों राज्यों की राजनीतिक परिस्थितियां बिल्कुल अलग हैं। ऐसे में एक ही नेता को दोनों राज्यों की जिम्मेदारी देना केंद्रीय संगठन के लिए एक तरह से साझा निगरानी का मॉडल है, जबकि स्थानीय स्तर पर सह-प्रभारियों के जरिए अलग-अलग जिम्मेदारियां संभाली जा सकती हैं। लेकिन यहबितन ही चुनौतीपूर्ण भी है। इसीलिए दिल्ली से रणनीति एक हो सकती है, लेकिन पटना और बेंगलुरु में उसका लोकल एडिशन अलग-अलग ही बनाना पड़ेगा।
पंजाब और जम्मू-कश्मीर दो चुनौतीपूर्ण मोर्चे पर सतीश पूनिया को प्रभारी बनाया गया है। दोनों राज्यों की राजनीतिक और भौगोलिक परिस्थितियां अलग हैं, लेकिन भाजपा के लिए दोनों ही संगठनात्मक दृष्टि से महत्वपूर्ण क्षेत्र हैं। पंजाब में पार्टी आगामी विधानसभा चुनाव की तैयारी कर रही है। वहीं जम्मू-कश्मीर में संगठनात्मक विस्तार और राजनीतिक उपस्थिति का सवाल अलग तरह की रणनीति मांगता है। इसलिए पूनिया के सामने दो अलग राजनीतिक जमीनों पर संगठन को सक्रिय रखने की जिम्मेदारी होगी।
2027 की तैयारी का होमवर्क
इस फेरबदल का समय सबसे ज्यादा ध्यान खींचता है। 2027 में उत्तर प्रदेश, पंजाब, उत्तराखंड, गुजरात, गोवा, मणिपुर समेत कई राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं।
ऐसे में नए प्रभारी केवल संगठनात्मक पदाधिकारी नहीं होंगे। आने वाले महीनों में उन्हें प्रदेश नेतृत्व, केंद्रीय संगठन, सरकार और चुनावी तैयारियों के बीच समन्वय की महत्वपूर्ण भूमिका निभानी होगी।
चुनाव अभी दूर दिखाई दे सकते हैं, लेकिन राजनीति में दूर की तारीखें अक्सर बहुत जल्दी पास आ जाती हैं। इसलिए भाजपा ने संगठनात्मक स्तर पर अपना 'होमवर्क' अभी से शुरू कर दिया है।
पूर्वोत्तर में भी संगठन का विस्तार
पूर्वोत्तर को भी नई व्यवस्था में अलग महत्व दिया गया है। असम की जिम्मेदारी मंगल पांडे को दी गई है। अन्य पूर्वोत्तर राज्यों के लिए भी अलग-अलग प्रभारी और सह-प्रभारी नियुक्त किए गए हैं। मंगल पांडे भाजपा के लिए पश्चिम बंगाल के संगठनात्मक अभियान में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा चुके हैं। अब असम की जिम्मेदारी उनके सामने है।
इसी बीच मेघालय में हाल ही में आठ विधायकों के भाजपा में शामिल होने की घटना ने पूर्वोत्तर की राजनीति में भाजपा के संगठनात्मक विस्तार को चर्चा में ला दिया है। ऐसे में क्षेत्र में नई प्रभारी व्यवस्था की भूमिका और महत्वपूर्ण हो जाती है।
पूरी सूची को देखें तो कम से कम तीन बड़े संगठनात्मक संकेत सामने आते हैं। पहला संकेत महत्वपूर्ण राज्यों में वरिष्ठ नेताओं की तैनाती है। पार्टी ने कई बड़े राज्यों की जिम्मेदारी ऐसे नेताओं को दी है जिनके पास राष्ट्रीय स्तर पर संगठन और राजनीति का अनुभव है।
दूसरा संकेत सह-प्रभारियों की बढ़ी हुई भूमिका। बड़े राज्यों में कई सह-प्रभारी नियुक्त करने से संकेत मिलता है कि पार्टी जिम्मेदारियों को ज्यादा बारीकी से बांटना चाहती है।
तीसरा संकेत एक नेता, दो राज्यों का मॉडल। इससे केंद्रीय नेतृत्व को अलग-अलग राज्यों में समान स्तर की संगठनात्मक निगरानी और समन्वय का अवसर मिल सकता है।
असली परीक्षा अब जमीन पर होगी। नितिन नबीन के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद प्रदेश प्रभारियों और सह-प्रभारियों की यह व्यापक नियुक्ति भाजपा के संगठनात्मक पुनर्गठन का महत्वपूर्ण चरण है। 28 राज्यों और 8 केंद्रशासित प्रदेशों में नई जिम्मेदारियां तय करना बताता है कि पार्टी ने राष्ट्रीय संगठन से लेकर प्रदेश इकाइयों तक अपनी जिम्मेदारी व्यवस्था को नए सिरे से व्यवस्थित किया है। लेकिन संगठन की असली ताकत प्रेस विज्ञप्ति में नहीं, जमीन पर दिखाई देती है।
अब देखना होगा कि नए प्रभारी राज्यों में कार्यकर्ताओं के साथ कितना तालमेल बनाते हैं, प्रदेश नेतृत्व और सरकार के बीच समन्वय कैसे कायम करते हैं और चुनावी तैयारियों को बूथ स्तर तक किस तरह पहुंचाते हैं।
फिलहाल भाजपा ने अपनी संगठनात्मक मशीनरी की सर्विसिंग कर दी है। अब 2027 के चुनावों की सड़क पर यह नई टीम कितनी रफ्तार पकड़ती है, इसका फैसला आने वाले महीनों में होगा।
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हिन्दुस्थान समाचार / सौरव राय
