सचिन पायलट से फायदे में रहे ज्योतिरादित्य सिंधिया, भाजपा में पद के साथ बराबर का सम्मान भी...
सचिन के पंजाब की जिम्मेदारी के बाद फिर उठे सवाल
नई दिल्ली, 07 सितंबर(हि.स.)। कभी कांग्रेस के दो युवा चेहरों के रूप में एक साथ देखे जाने वाले सचिन पायलट और ज्योतिरादित्य सिंधिया की राजनीतिक यात्राएं अब दो बिल्कुल अलग विचारधाराओं और दिशाओं में खड़ी दिखाई देती हैं। दोनों के पास राजनीतिक विरासत थी, दोनों युवा थे। दोनों अपने-अपने राज्यों में प्रभावशाली माने जाते थे और दोनों ने कांग्रेस के भीतर नेतृत्व को लेकर असंतोष का सामना किया। फर्क यह रहा कि सिंधिया ने निर्णायक राजनीतिक कदम उठाया और सत्ता के केंद्र में पहुंच गए, जबकि सचिन पायलट कांग्रेस में रहकर अपने राजनीतिक भविष्य का इंतजार करते रहे।
अब पायलट को पंजाब की जिम्मेदारी दिए जाने के बाद यह सवाल फिर सामने है कि क्या कांग्रेस उन्हें राष्ट्रीय राजनीति में स्थापित कर रही है या राजस्थान की राजनीति से धीरे-धीरे दूर कर रही है? यदि दोनों नेताओं की मौजूदा राजनीतिक स्थिति को साथ रखकर देखा जाए तो तस्वीर सिंधिया के पक्ष में अधिक स्पष्ट नजर आती है।
सिंधिया ने जोखिम लिया, मिला सत्ता का पुरस्कार
ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कांग्रेस के साथ अपने लंबे राजनीतिक रिश्ते को खत्म कर भाजपा का रास्ता चुना। यह फैसला राजनीतिक रूप से जोखिम भरा था, मगर उसके बाद उनकी राजनीतिक स्थिति में बड़ा बदलाव आया। वे भाजपा के साथ सत्ता में आए और केंद्र सरकार में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी हासिल की। इसका अर्थ यह नहीं कि सिंधिया का रास्ता आसान था। दल बदलना अपने आप में बड़ा राजनीतिक जोखिम था और इसके साथ आलोचना भी जुड़ी, किंतु परिणाम की कसौटी पर देखें तो सिंधिया ने अपनी राजनीतिक असहमति को सत्ता और संगठन में प्रभाव में बदल दिया।
इसके उलट सचिन पायलट ने कांग्रेस से अलग होने का रास्ता नहीं चुना। उन्होंने पार्टी के भीतर रहकर अपनी राजनीतिक जमीन बनाए रखने को प्राथमिकता दी। इसका उन्हें संगठन में भूमिका के रूप में लाभ जरूर मिला, पर सत्ता के स्तर पर वह उपलब्धि नहीं मिल सकी जिसकी संभावना उनके राजनीतिक कद को देखते हुए लंबे समय से जताई जाती रही है।
पायलट के सामने राजस्थान की सबसे बड़ी चुनौती
सचिन पायलट की वास्तविक ताकत राजस्थान है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में उन्होंने संगठन को मजबूत किया और 2018 में कांग्रेस की सत्ता वापसी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उपमुख्यमंत्री बनने के बाद मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के साथ उनके मतभेद सार्वजनिक हुए और राजस्थान कांग्रेस की राजनीति लंबे समय तक दो ध्रुवों में बंटी रही। अब यही गुटीय राजनीति पायलट के लिए सबसे बड़ी चुनौती बनती दिखी है।
पंजाब की जिम्मेदारी उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर सक्रिय रहने का अवसर जरूर देती है, मगर इसका दूसरा पहलू यह है कि राजस्थान की राजनीति में उनकी प्रत्यक्ष मौजूदगी कम होगी। राजनीति में लंबे समय तक अनुपस्थिति राजनीतिक रिक्तता पैदा करती है और उस रिक्तता को भरने के लिए दूसरे नेता तेजी से आगे आते हैं। ऐसे में जहां सिंधिया और पायलट की राजनीतिक यात्राओं का अंतर और बड़ा दिखाई देता है। सिंधिया ने अपनी राजनीतिक जमीन मध्य प्रदेश से आगे बढ़ाकर दिल्ली की सत्ता में जगह बनाए रखी, जबकि पायलट को अपनी सबसे मजबूत राजनीतिक जमीन राजस्थान में ही लगातार चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों से जूझना पड़ रहा है।
पंजाब की जिम्मेदारी को पायलट के लिए राष्ट्रीय अवसर के रूप में देखा जा सकता है। यदि वे पंजाब में कांग्रेस के संगठन और चुनावी रणनीति को प्रभावी ढंग से संभालते हैं तो पार्टी में उनका राष्ट्रीय कद बढ़ सकता है। भविष्य में उन्हें कांग्रेस संगठन में और बड़ी जिम्मेदारी मिलने की संभावना भी बन सकती है। मगर राजनीतिक सवाल यह है कि क्या राष्ट्रीय भूमिका राजस्थान की राजनीतिक जमीन की भरपाई कर पाएगी? यदि पायलट लगातार राष्ट्रीय जिम्मेदारियों में व्यस्त रहते हैं और राजस्थान में कांग्रेस के भीतर कोई दूसरा गुट अपनी पकड़ मजबूत कर लेता है तो 2028 के विधानसभा चुनाव से पहले समीकरण उनके लिए बदल सकते हैं। राजस्थान में उनकी वापसी तब उतनी सहज नहीं होगी जितनी आज दिखाई देती है।
पायलट के लिए सबसे बड़ा खतरा
पायलट के सामने तीन संभावित रास्ते दिखाई देते हैं। पहला, वे पंजाब में अपनी क्षमता साबित कर राष्ट्रीय राजनीति में बड़ा स्थान बनाएं और राजस्थान को अपने राजनीतिक आधार के रूप में बनाए रखें। दूसरा, राष्ट्रीय जिम्मेदारियों में उनकी सक्रियता बढ़ती जाए और राजस्थान धीरे-धीरे उनके हाथ से निकलता जाए। तीसरा, लंबे इंतजार के बाद यदि उन्हें लगे कि कांग्रेस में उनकी राजनीतिक संभावनाएं सीमित की जा रही हैं तो वे भविष्य में किसी नए विकल्प पर विचार करें। फिलहाल तीसरे विकल्प की संभावना सबसे कम दिखाई देती है। पायलट ने कांग्रेस में बने रहकर अपनी राजनीति को आगे बढ़ाने का रास्ता चुना है। यही उनकी ताकत भी है और सबसे बड़ी चुनौती भी।
सिंधिया और पायलट के राजनीतिक जीवन को एक पंक्ति में समझें तो तस्वीर बेहद साफ है, सिंधिया ने राजनीतिक जोखिम लेकर सत्ता हासिल की, पायलट ने राजनीतिक धैर्य दिखाकर पार्टी के भीतर अपनी जगह बनाए रखी है। सिंधिया आज केंद्र की सत्ता में प्रभावशाली भूमिका में हैं। पायलट के पास संगठनात्मक अनुभव, जनाधार और राष्ट्रीय पहचान है, मगर सत्ता का वह प्रत्यक्ष लाभ नहीं है जो सिंधिया को मिला।यही कारण है कि पंजाब की नई जिम्मेदारी पायलट के लिए अवसर होने के साथ-साथ एक राजनीतिक परीक्षा भी है। यदि वे इसे राष्ट्रीय पहचान में बदलते हैं तो कांग्रेस के भीतर उनकी स्थिति मजबूत होगी। यदि राजस्थान में उनकी राजनीतिक जमीन इस दौरान कमजोर होती है तो यह जिम्मेदारी उलटा असर भी डाल सकती है।
एक सख्त निर्णय ओर सिंधिया आगे निकल गए!
सचिन पायलट और ज्योतिरादित्य सिंधिया की तुलना आज इसलिए, क्योंकि दोनों लगभग एक ही दौर में कांग्रेस की युवा राजनीति के बड़े चेहरे बनकर उभरे थे। एक ने पार्टी बदलकर अपनी राजनीतिक दिशा बदल दी और सत्ता में पहुंच गया; दूसरे ने पार्टी के भीतर रहकर संघर्ष जारी रखा।अब पंजाब की जिम्मेदारी पायलट के सामने एक और मौका लेकर आई है। यह मौका उन्हें सिंधिया की बराबरी में राष्ट्रीय प्रभाव हासिल करने का रास्ता दे सकता है, मगर इसके लिए उन्हें पंजाब की चुनौती को सफलता में बदलना होगा और साथ ही राजस्थान में अपनी राजनीतिक जमीन बचाए रखनी होगी।
फिलहाल राजनीतिक तराजू सिंधिया के पक्ष में झुका हुआ है। क्योंकि भले ही पायलट के पास जनाधार और राजनीतिक क्षमता की कमी नहीं, लेकिन सामने से दिखाई यही दे रहा है कि एक सख्त निर्णय से सिंधिया आगे निकल गए हैं ! अब आगे भी पता नही, जैसा कि अक्सर कांग्रेस की राजनीति में होता है सफल हुए तो राहुल गाँधी की जय-जय, वाह, वाह। अन्यथा पायलट तो हैं हीं हार का ठीकरा फोड़ने के लिए...। पंजाब का अध्याय इसी सवाल का अगला उत्तर तय करेगा।
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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी
