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खेतों से मशरूम तक : मिथिला दीदी ने मेहनत से लिखी आत्मनिर्भरता की नई इबारत

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खेतों से मशरूम तक : मिथिला दीदी ने मेहनत से लिखी आत्मनिर्भरता की नई इबारत


खेतों से मशरूम तक : मिथिला दीदी ने मेहनत से लिखी आत्मनिर्भरता की नई इबारत


खेतों से मशरूम तक : मिथिला दीदी ने मेहनत से लिखी आत्मनिर्भरता की नई इबारत


डेढ़ लाख के निवेश से शुरू किया कारोबार, आज हर महीने 50 हजार रुपये की कमाई

रायपुर, 07 सितंबर (हि.स.)। कभी परिवार की आजीविका केवल पारंपरिक खेती पर निर्भर थी, लेकिन सीमित आय के बीच बेहतर भविष्य का सपना देखने वाली छत्तीसगढ़ के सारंगढ़-बिलाईगढ़ जिले के बरमकेला विकासखंड के ग्राम खोरीगांव की मिथिला नायक ने हार नहीं मानी। उन्होंने अवसर को पहचाना, प्रशिक्षण लिया और मशरूम उत्पादन को अपना व्यवसाय बनाकर आज आत्मनिर्भरता की मिसाल कायम कर दी है। अब वे हर महीने करीब 50 हजार रुपये की आय अर्जित कर रही हैं और क्षेत्र की अन्य महिलाओं के लिए प्रेरणा बन गई हैं।

’1 लाख 50 हजार रूपये की शुरुआती पूंजी से सफर का आगाज’

मशरूम उत्पादन का व्यवसाय शुरू करने के लिए उन्होंने सखी क्लस्टर संगठन से ऋण 1 लाख 20 हजार रूपये, अपनी व्यक्तिगत बचत से 30 हजार रूपये इस प्रकार कुल शुरुआती लागतरू 1 लाख 20 हजार रूपये से मशरूम उत्पादन का कार्य शुरू की। शुरुआती दौर में यह कार्य नया था, लेकिन सीखने की ललक और निरंतर प्रयासों से जल्द ही मशरूम उत्पादन एक सफल आजीविका गतिविधि में बदल गया। शुरुआती दौर में तापमान नियंत्रण, मार्केटिंग और तकनीकी जानकारी की कमी जैसी कई समस्याएं सामने आईं। लेकिन मिथिला दीदी ने प्रशिक्षण लेकर और आपसी सहयोग से इन सभी चुनौतियों को अवसर में बदल दिया।चुनौतियों से नहीं डरीं

शुरुआती दौर आसान नहीं था। तापमान नियंत्रण, तकनीकी जानकारी और बाजार तक पहुंच जैसी कई चुनौतियां सामने आईं। लेकिन सीखने की इच्छा, प्रशिक्षण और लगातार मेहनत के बल पर उन्होंने हर मुश्किल का समाधान खोज लिया। धीरे-धीरे उनका उत्पादन बढ़ा और स्थानीय बाजार में मशरूम की मांग भी बढ़ने लगी।

हर महीने 50 हजार रुपये की आमदनी

आज मिथिला नायक अपने घर से ही मशरूम का उत्पादन कर स्थानीय बाजारों में इसकी बिक्री कर रही हैं। बेहतर गुणवत्ता और नियमित उत्पादन के कारण उनका कारोबार लगातार बढ़ रहा है। मिथिला बतातीं है कि वर्तमान में वे प्रतिमाह लगभग 50 हजार रुपये की आय अर्जित कर रही हैं, जिससे परिवार की आर्थिक स्थिति में उल्लेखनीय सुधार आया है।

दूसरी महिलाओं के लिए बनीं प्रेरणा

मिथिला की सफलता ने आसपास के गांवों की महिलाओं में भी स्वरोजगार के प्रति नई सोच पैदा की है। उनकी कहानी यह संदेश देती है कि सही मार्गदर्शन, प्रशिक्षण, वित्तीय सहयोग और दृढ़ संकल्प के साथ ग्रामीण महिलाएं भी सफल उद्यमी बन सकती हैं। ग्रामीण आजीविका मिशन के माध्यम से मिले सहयोग ने मिथिला नायक को केवल आर्थिक रूप से सशक्त ही नहीं बनाया, बल्कि उन्हें आत्मविश्वास और सामाजिक पहचान भी दिलाई। उनकी यह सफलता ग्रामीण अर्थव्यवस्था में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी और आत्मनिर्भर भारत की सोच को मजबूती देने का सशक्त उदाहरण है।

’सुशासन नीति और बेहतर मॉनिटरिंग का परिणाम’

मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व में राज्य सरकार द्वारा ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने और महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने पर विशेष जोर दिया जा रहा है। जिला प्रशासन की सतत् मॉनिटरिंग और जमीनी स्तर पर मार्गदर्शन से सरकारी योजनाओं का सीधा लाभ वास्तविक हितग्राहियों तक पहुँच रहा है, जिससे ग्रामीण महिलाएं स्वरोजगार के नए अवसर गढ़ रही हैं। आज आत्मनिर्भर भारत की सोच को जमीन पर उतारते हुए यह संदेश दे रही है कि छोटे कदम भी बड़े बदलाव ला सकते हैं।

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हिन्दुस्थान समाचार / गेवेन्द्र प्रसाद पटेल